
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने गुरुवार को कहा कि बढ़ते राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक की अधिक रुपया छापने की कोई योजना नहीं है। यह लगातार तीसरा साल है, जब सरकार ने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को संशोधित किया है। बजट में राजकोषीय घाटा चालू वित्त वर्ष में 3.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है, जबकि पिछले बजट में इसके 3.3 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई थी।
वहीं अगले वित्त वर्ष 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटा 3.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि जुलाई 2019 में इसके 3 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई थी। सरकार का राजकोषीय घाटा दिसंबर अंत में 132 प्रतिशत को पार कर गया है।
क्या होता है राजकोषीय घाटा?
सरकार की कुल आय और खर्च में अंतर को राजकोषीय घाटा कहा जाता है। इससे पता चलता है कि सरकार को कामकाज चलाने के लिए कितनी उधारी की जरूरत होगी। राजकोषीय घाटा आमतौर पर आय में कमी या पूंजीगत व्यय में अत्यधिक वृद्धि के कारण होता है।
FRMB कानून का इस्तेमाल
दास ने मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद संवाददाताओं से कहा, ‘राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए अतिरिक्त नोट छापने की कोई योजना नहीं है।’ सरकार ने बजट में राजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन (FRMB) कानून के तहत छूट उपबंध का उपयोग किया है। इसके अंतर्गत राजकोषीय घाटा रूपरेखा के लिए 0.5 प्रतिशत वृद्धि की गुंजाइश उपलब्ध है।
नहीं घटाया रीपो रेट
बता दें कि बजट के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से आस लगाकर बैठे मिडिल क्लास को गुरुवार को निराशा हाथ लगी है। आरबीआई ने गुरुवार को चालू वित्त वर्ष की अंतिम द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में रीपो रेट को 5.15 के स्तर पर बरकरार रखने का फैसला किया है। केंद्रीय बैंक ने अनिश्चित वैश्विक माहौल और घरेलू बाजार में मुद्रास्फीति तेज होने तथा बजट में राजकोषीय घाटे का अनुमान बढ़ाये जाने के बीच यह कदम उठाया है
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