बात-अंदाज में केजरीवाल बिल्कुल मोदी निकले: पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

दिल्ली के रामलीला मैदान में अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री-पद की तीसरी पारी की शुरुआत भारत माता की जय, इंकलाब जिंदाबाद और वंदे मातरम से की। अरविंद केजरीवाल के माथे पर पहली बार अक्षत-कुंकुम वाला लाल टीका था। यह बजरंग बली के आशीर्वाद से मिली विजय का खामोश उद्घोष था।

शपथ लेते वक्त केजरीवाल के सिर पर आम आदमी पार्टी की टोपी नहीं थी, सफेद शर्ट पर लाल रंग का स्वेटर था लेकिन गले में सिग्नेचर मफलर नहीं था। रामलीला मैदान में आम आदमी पार्टी के झंडे से ज्यादा तिरंगे लहरा रहे थे। रामलीला ग्राउंड केजरीवाल के लिए आंदोलन का मैदान रहा है, उसी मैदान में नए राजनीतिक प्रतीकों से नया परसेप्शन गढ़ रहे केजरीवाल ने डायरेक्ट नरेंद्र मोदी का आशीर्वाद मांगा।

आइए, इस नए केजरीवाल की क्रोनोलॉजी समझिए। उसी रामलीला मैदान में केजरीवाल का यह बिल्कुल नया रूप है, जहां उन्होंने अन्ना के आंदोलन की अगुवाई की; जहां उन्होंने पूरी सियासी जमात को उसकी औकात बताई; जहां उन्होंने दो बार पहले भी शपथ ली, मगर इस बार धार्मिक और राष्ट्रवादी प्रतीकों का इस्तेमाल था। इन प्रतीकों में टीका और तिरंगा शामिल था। अब तक सबसे टकराने, सबसे भिड़ने के लिए जाने जाने वाले अरविंद केजरीवाल अब टकराव को टालने वाले केजरीवाल हैं।

मोदी ही नहीं, पूरी बीजेपी ब्रिगेड के लिए उनके पास फ्रेंडशिप का मैसेज है लेकिन उस विपक्ष के लिए कहीं कोई जगह नहीं है जिसने परोक्ष-प्रत्यक्ष ढंग से केजरीवाल की जीत के लिए कुछ-न-कुछ किया, ताकि बीजेपी को सत्ता से दूर रखा जाए। अब केजरीवाल कह रहे हैंः चुनाव के दौरान जो भी राजनीतिक उठा-पटक हुई, उसे भूल जाओ। दिल्ली में नई किस्म की राजनीति शुरू हुई है। दिल्ली मॉडल अब पूरे देश में दिख रहा है। चुनाव में जिन्होंने हमें बुरा कहा, मैंने उनको माफ किया।

यह केजरीवाल चौंकाता है

केजरीवाल के इस नए अंदाज से सवाल उठता है- क्या केजरीवाल मोदी से मेलजोल कर नया सियासी समीकरण खड़ा कर रहे हैं? क्या केजरीवाल में यह बदलाव सिर्फ दिल्ली का कायाकल्प करने के लिए है? क्या केजरीवाल टकराव टालकर देश भर में आप को फैलाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं? या वह भविष्य में नरेंद्र मोदी स्टाइल पॉलिटिक्स का विकल्प बनना चाहते हैं?

इन सवालों के जवाब आने वाला कल देगा। लेकिन केजरीवाल के मैसेज और डायलॉग डिलीवरी के अंदाज पर नरेंद्र मोदी की एक माइल्ड छाप साफ दिखती है, जब दिल्ली का मुख्यमंत्री दुनिया भर में भारत का डंका बजाना चाहता है। इस केजरीवाल का दिखाया सपना तो एकदम मोदी से मिलता हैः “दोस्तों, मेरा एक सपना है, जो मैं चाहता हूं पूरे देशवासियों का सपना हो। हम चाहते हैं एक वक्त ऐसा आए जब पूरी दुनिया के अंदर भारत का डंका बजे। लंदन, टोक्यो, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में भी भारत का डंका बजेगा। इसके लिए नई राजनीति की शुरूआत होनी चाहिए जो दिल्ली के लोगों ने चुनाव में कर दी है।”

अरविंद केजरीवाल की जगह नरेंद्र मोदी का चेहरा रखकर देखें तो बिल्कुल एक-जैसी बातें। मोदी इंडिया फर्स्ट के मिशन को आगे बढ़ाने में लगे हैं तो केजरीवाल दुनिया भर में भारत का डंका बजाने की बात कर रहे हैं। मोदी ने देश को गुजरात मॉडल दिखाया था। केजरीवाल दिल्ली मॉडल दिखाकर लुभा रहे हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी यूएसपी थी- सस्ती बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त बस यात्रा और मुफ्त इलाज। केजरीवाल पर ‘फ्रीबीज पॉलिटिक्स’ करने के आरोप लगे, मगर केजरीवाल ने आरोप लगाने वालों पर लानत भेजी। इंसान से इंसान के भाईचारे की बात करने वाले केजरीवाल आज हम होंगे कामयाब के गीत गा रहे हैं। जाहिर है, उन्हें कामयाबी का चस्का लग चुका है।

यह वही केजरीवाल हैं, जिन्होंने इस चुनाव में दिल्ली के एक भी मुस्लिम मोहल्ले का रुख नहीं किया। किसी भी मुस्लिम मंच पर नहीं दिखे। शाहीन बाग की औरतों के धरने पर नहीं गए। नागरिकता संशोधन कानून पर रहस्यमय चुप्पी साधे रखी। खुलकर बजरंग बली की गदा लहराई। हनुमान जी का आशीर्वाद ले गए और पिछले दरवाजे से मुसलमानों के एकमुश्त वोट भी।

सूत्रों की मानें तो मटिया महल से विधायक रहे शोएब इकबाल आम आदमी पार्टी ज्वायन करने से पहले सीएए के खिलाफ बड़े आंदोलन का प्लान कर रहे थे। जब केजरीवाल के दर पर उन्होंने मत्था टेका, तो पहला आदेश मिला- यह आंदोलन बंद करना पड़ेगा। शोएब इकबाल के करीबी इससे कुलबुलाए भी। मगर यह आंदोलन बंद करना पड़ा। अगर यह सच है तो केजरीवाल किसके इशारे पर सीएए विरोधी आंदोलनों पर पानी डाल रहे थे। सीएए मुसलमानों, दलितों, गरीबों की भावना से जुड़ा है। मगर यह भी सच है कि उन सबसे जुड़े आंदोलन से मुंह फेरने के बाद भी आम आदमी पार्टी के पांचों मुसलमान प्रत्याशी बंपर वोटों से जीतकर आए।

सवाल है कि केजरीवाल मुसलमानों की मजबूरी समझ रहे थे या मुसलमान केजरीवाल का दांव। अब चुनावों के बीच आए एक और बयान पर गौर करिए। ध्यान दीजिए, संघ के नंबर दो भैयाजी जोशी ने दिल्ली चुनाव के बीच क्या बयान दियाः बीजेपी का विरोध हिंदुत्व का विरोध नहीं है। इस बयान का मतलब साफ था कि हिंदुत्व अकेले बीजेपी की बपौती नहीं है, कुछ और पार्टियां चाहें तो इस राह पर आकर संघ का समर्थन पा सकती हैं। सवाल है कि क्या यह बयान केजरीवाल के लिए ही था? क्या संघ के इस बयान के बाद ही केजरीवाल के रुख में बजरंगी भाईजान वाला बदलाव देखा गया?

कहने को ये अनुमान हैं, मगर बेजान नहीं हैं। केजरीवाल जब कामयाब होने के गीत गा रहे हैं तो ठीक उसी वक्त वह मेजॉरिटेरियन पॉलिटिक्स की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं। यह विचित्र विरोधाभास है, लेकिन है। केजरीवाल जब मुस्लिम मोहल्लों से कन्नी काटते हैं, शाहीन बाग और सीएए विरोध से बचते हैं तो वह वही कर रहे हैं जो, संघ के संस्थापक सदस्य और दूसरे सर संघचालक गुरु गोलवलकर का स्वप्न था- मुसलमान इस देश में रहे लेकिन दोयम दरजे का नागरिक बनकर- बहुसंख्यक आबादी के आगे हुनर बेचता और पेश करता हुआ। राजनीति में उसकी निर्णायक भूमिका बिल्कुल न हो। इसे समझने के लिए आप उनकी किताब ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ का संदर्भ ले सकते हैं।

महात्मा गांधी साधन और साध्य के बीच पवित्रता के कारक पर जोर देते थे। सियासत में अगर आप ने ईमानदारी का रिस्क लिया, तो कुछ गंवाना भी पड़ सकता है। केजरीवाल अब हम होंगे कामयाब का एंथम गा रहे हैं। जरा सोचिए, पुलवामा अटैक की बरसी पर तब के कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कड़वे सवाल पूछने का रिस्क लेते हैं- यह जानकर भी कि अंध राष्ट्रभक्ति के आगे उन्हें किस तरह पेन्ट किया जाएगा। वह चैतरफा हमलों का भी शिकार हुए, मगर पूछा किः आखिर इस कांड की जांच रिपोर्ट कहां है, जिम्मेदार कौन था, इसका फायदा किसने उठाया। मगर सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने वाले अरविंद केजरीवाल सिर्फ शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देकर चुप्पी साध गए। इस बदले-बदले केजरीवाल की क्रोनोलॉजी को समझना तो होगा, और पूछना होगाः पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स है क्या?

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