सीजेआई के सामने डिटेंशन सेंटर, हिटलर के क़त्लगाह ज़िक्र कर कनाडा के पूर्व मंत्री ने, कहा- आवाज़ उठाएँ

सीजेआई के सामने डिटेंशन सेंटर, हिटलर के क़त्लगाह ज़िक्र कर कनाडा के पूर्व मंत्री ने, कहा- आवाज़ उठाएँ

ऑश्वित्ज़ यानी क़त्लगाह, असम के डिटेंशन सेंटर और बाक़ी दुनिया के डिटेंशन सेंटर में क्या कोई जुड़ाव है? क्या इसका जर्मन लूथरन पादरी मार्टिन नीमोलर की कविता ‘…जब वे मेरे लिए आए तो मेरे पक्ष में बोलने वाला कोई नहीं था’ से कुछ लेना देना है? वैसे तो ऐसा कोई संबंध नहीं है, लेकिन किसी कार्यक्रम में इन सब का एक साथ ज़िक्र होना ख़ास मायने रखता है और इसका एक संदेश भी जाता है। वह भी तब जब सामने देश के मुख्य न्यायाधीश यानी सीजेआई एस ए बोबडे बैठे हों।

दरअसल, गुरु नानक देव की 550वीं जयंती के उपलक्ष्य में चंडीगढ़ में शनिवार को पंजाब हरियाणा बार काउंसिल का कार्यक्रम था। इसमें मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे भी शामिल थे। ब्रिटिश कोलंबिया के पूर्व एटॉर्नी जनरल और कनाडा के पूर्व संघीय मंत्री उज्ज्वल दोसांझ दुनिया भर में डिटेंशन सेंटर के संदर्भ में गुरु नानक के विचारों और सीखों के हवाले से अपने विचार रख रहे थे। इसी दौरान उन्होंने असम के डिटेंशन सेंटर और बाक़ी दुनिया के डिटेंशन सेंटर, क़त्लगाह ऑश्वित्ज़ की कहानियाँ सुनाईं। ऑश्वित्ज़ जर्मनी में हिटलर का क़त्लगाह का नाम है। कल्पनाओं से भी परे यहाँ लोगों को मारने के तरीक़े अपनाए जाते थे। रुह कँपा देने वाली मौतें दी जाती थीं।

ऑश्वित्ज़ में कैद और अनिवार्य हत्या की प्रतीक्षा कर रहे लोगों में से जो बचे रह गए थे उन्हें 75 साल पहले, 27 जनवरी, 1945 को सोवियत संघ की लाल सेना ने मुक्त किया था।

कार्यक्रम में दोसांझ ने जब अपने भाषण की शुरुआत की तो उन्होंने ऑश्वित्ज़ में कैद और अनिवार्य हत्या की प्रतीक्षा कर रहे लोगों की मुक्ति की सालगिरह का ज़िक्र किया। इसके बाद उन्होंने आज के जमाने में गुरु नानक की सीखों की महता को बताया। दोसांझ ने कहा कि उनको सिर्फ़ धर्मग्रंथों तक नहीं समेटा जा सकता है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, दोसांझ ने कहा कि ऑस्वित्ज़ कैंप में लाखों लोगों का नरसंहार किया गया। उन्होंने कहा कि वे सभी डिटेंशन कैंप थे। दोसांझ ने कहा, ‘यदि आज डिटेंशन कैंप हैं, चाहे वे चीन में हों, असम और ट्रंप के संयुक्त राज्य अमेरिका में… ग़रीबी, अन्याय से आज़ादी की ओर भागते बच्चों को बंद करना… तो गुरु नानक मुझसे पूछते कि क्या तुम आवाज़ उठा रहे हो… क्या तुमने पढ़ा भी, क्या तुमने कुछ बोला भी या क्या आगे बढ़कर संघर्ष किया और दुनिया में बदलाव देखा।’

दोसांझ ने कहा, ‘आपको लगता है कि नानक उस सब के सामने चुप हो जाते… नानक जिन्होंने कहा है- राजा शेर बन गए हैं और उनके अधीनस्थ कुत्तों से बेहतर नहीं हैं… उन्होंने यह बाबर को कहा था… उन्होंने बाबर, बाबर के आक्रमणों की ज़्यादती को चुनौती दी। नानक कभी चुप नहीं रहते। नानक ज़रूर बोलते। नानक सबसे आगे रहते।’

दोसांझ का असम में डिटेंशन सेंटर का ज़िक्र ऐसे समय में आया है जब असम में एनआरसी आने के बाद डिटेंशन कैंप को लेकर विवाद हो गया है। ऐसा तब हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जन सभा में जब ज़ोर देकर कहा कि देश में एक भी डिटेंशन कैंप यानी अवैध विदेशियों के लिए बंदी गृह नहीं है। हालाँकि यह बात सही नहीं है। असम की तरुण गोगोई सरकार ने ग़ैरक़ानूनी रूप से रह रहे बांग्लादेशियों की पहचान करने और उन्हें उनके देश भेजने के लिए 2012 में एक श्वेत पत्र जारी किया था। इसमें कहा गया था कि ग्वालपाड़ा, कोकराझाड़ और सिलचर में डिटेंशन कैम्प बनाए गए हैं। यह भी कहा गया था कि ग्वालपाड़ा डिटेंशन कैम्प में 66, कोकराझाड़ में 32 और सिलचर में 20 अवैध बांग्लादेशियों को रखा गया है। बाद में तेज़पुर, ज़ोरहाट और डिब्रूगढ़ में भी इस तरह के डिटेंशन कैम्प बनाए गए।

असम में एनआरसी आने के बाद सरकार ने 2016 में इस ओर ज़्यादा ध्यान दिया और 2017 में ग्वालपाड़ा के मटिया में बड़ा डिटेंशन कैंप बनाने की योजना बना डाली। इसने मटिया में इस डिटेंशन कैम्प के लिए 20 बीघा ज़मीन भी अलॉट कर दिया। असम के 6 डिटेंशन कैम्पों में 1,000 लोग रहते हैं। पर फ़ॉरनर्स ट्राइब्यूनल ने 85 हज़ार लोगों की पहचान अवैध विदेशियों के रूप में की है।

दोसांझ ने विरोध की आवाज़ नहीं उठाने के नुक़सान भी बताए। अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, दोसांझ ने जर्मन लूथरन पादरी मार्टिन नीमोलर के कबूलनामे का भी ज़िक्र किया और हिटलर द्वारा यहूदियों, रोम और जिप्सी के ख़िलाफ़ किए गए अपराधों के बारे में बात की। उन्होंने कहा-  “उन्होंने कहा कि पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए थे; और मैं नहीं बोला क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था। फिर वे समाजवादियों के लिए आए; और मैं इसलिए नहीं बोला क्योंकि मैं समाजवादी नहीं था। फिर वे ट्रेड यूनियनवादियों के लिए आए; और मैं नहीं बोला क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनवादी नहीं था। फिर वो यहूदियों के लिए आए; और मैं नहीं बोला क्योंकि मैं यहूदी नहीं था। फिर वे मेरे लिए आए, और मेरे लिए बोलने के लिए कोई नहीं बचा था…”।

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