तेजी से अमेरिकी खेमे में जाता भारत और खत्म होती ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ की पहचान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का काफी हद तक केवल चाक्षुष (ऑप्टिकल) महत्व है। चुनाव के साल में ट्रंप अपने देशवासियों को दिखाना चाहते हैं कि वह अमेरिका के बाहर कितने लोकप्रिय हैं। उनके स्वागत की जैसी व्यवस्था अहमदाबाद में की गई, वह भी यही बताती है। इस स्वागत-प्रदर्शन से हटकर भी भारत और अमेरिका के रिश्तों के संदर्भ में इस यात्रा का महत्व है।

आमतौर पर ट्रंप द्विपक्षीय यात्राओं पर नहीं जाते। उनकी दिलचस्पी या तो बहुपक्षीय शिखर सम्मेलनों में होती है या ऐसी द्विपक्षीय बैठकों में, जिनमें किसी समस्या के बड़े समाधान को हासिल करने की कोशिश हो। पिछले साल के गणतंत्र दिवस पर भारत आने का प्रस्ताव ठुकरा कर वह भारत को एक राजनयिक झटका लगा चुके हैं। बहरहाल नाटकीयता अपनी जगह है, दोनों देशों के रिश्तों का महत्व है।

इस यात्रा के दौरान पर्यवेक्षकों का ध्यान कारोबारी रिश्तों पर रहेगा। माना जा रहा है कि चीन भारत का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी है, पर अब अमेरिका ने उसे पीछे छोड़ दिया है। साल 1999 में दोनों देशों के बीच जो कारोबार 16 अरब डॉलर का था, वह 2018 में 142 अरब डॉलर का हो गया। पिछले दो वर्षों में अमेरिका ने भारतीय माल पर टैक्स बढ़ाया है और भारत को प्राप्त जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफरेंस (जीएसपी) के तहत मिलने वाली सुविधाएं खत्म कर दी हैं, पर दोनों देशों के सामरिक रिश्तों में गर्मजोशी है। यह तेजी पिछले दो दशकों में आई है।

इसका एक बड़ा कारण शीत युद्ध के बाद की स्थितियां हैं। अफगानिस्तान में तालिबान और अलकायदा के उदय के बाद 9/11 की परिघटना ने एक तरफ जेहादी राजनीति के कारण दोनों देशों को करीब आने को प्रेरित किया, दूसरी ओर चीन के उदय के कारण अमेरिका को खासतौर से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के करीब आने की जरूरत महसूस हुई है। साल 1998 में नाभिकीय परीक्षण के बाद भारतीय रक्षा तकनीक पर अमेरिका ने कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे। समय के साथ वे प्रतिबंध न सिर्फ हटे बल्कि जुलाई, 2005 में अमेरिका के साथ हुए सामरिक समझौते के बाद रिश्तों में गुणात्मक बदलाव आया है। और अब रक्षा तकनीक के साथ-साथ भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के सामरिक सहयोगी के रूप में उभर रहा है और ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ की हमारी पहचान खत्म हो रही है।

स्वाभाविक दोस्ती

अमेरिका में राष्ट्रपति चाहे डेमोक्रेटिक पार्टी के रहे हों या रिपब्लिकन पार्टी के और संसद में किसी भी पार्टी का बहुमत रहा हो भारत के साथ रक्षा सहयोग को पूरा समर्थन मिला है। परिस्थितियां भी ऐसी बनीं कि अमेरिका के रिश्ते अपने पूर्व सहयोगी पाकिस्तान के साथ बिगड़ते गए। दूसरी तरफ साल 1962 के युद्ध के बाद से भारत और चीन के रिश्तों में जो तल्खी पैदा हुई, वह खत्म होती नजर नहीं आ रही है। चीन-पाकिस्तान गठजोड़ की वजह से भी दोनों देश करीब आए हैं।

इस इलाके में भारत ही अकेला देश है, जहां आधुनिक लोकतांत्रिक इस पृष्ठभूमि में जापान और ऑस्ट्रेलिया भी कमोबेश अपने-अपने कारणों से चीन से प्रतिस्पर्धा रखते हैं। दक्षिण एशिया के शेष देशों से लेकर सुदूर पूर्व तक के इलाके के साथ भारत के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं। बढ़ते समुद्री व्यापार के मद्देनज़र भारत पर हिंद महासागर से लेकर प्रशांत तक के क्षेत्र में सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आ गई है। एक समय तक राजनयिक भाषा में जिस भौगोलिक क्षेत्र को एशिया-प्रशांत कहा जाता था, उसे अब हिंद-प्रशांत का नाम दिया गया है।

रक्षा तकनीक

भारत एक तरफ अमेरिका के साथ सामरिक समझौते कर रहा है, वहीं उसकी रूस से दूरी बढ़ती नजर आ रही है। पर यह इतनी सरल बात नहीं है, जितनी नजर आ रही है। भारत की सामरिक शक्ति का तीन-चौथाई भाग रूसी तकनीक पर आश्रित रहा है। भले ही अब उसमें कमी आई हो पर वह एकदम से समाप्त भी नहीं हो सकता। आज भी भारत को जो तकनीक चाहिए, वह पूरी तरह अमेरिकी भरोसे पर पूरी नहीं हो सकती। मसलन हवाई हमलों से रक्षा के लिए भारत जिस एस-400 प्रणाली को खरीद रहा है, उसके समकक्ष अमेरिकी प्रणाली एक तो उतनी प्रभावशाली नहीं है, दूसरे वह काफी महंगी है। भारत ने अमेरिका के सामने यही दलील दी है कि हमारे सामने विकल्प क्या है?

ट्रंप की इस यात्रा के ठीक पहले की खबर है कि दोनों देशों के बीच करीब 3.5 अरब डॉलर के रक्षा उपकरणों की खरीद के प्रस्ताव तैयार हैं। दिल्ली की सुरक्षा के लिए भारत अमेरिका की एनएएएएमएस-2 हवाई सुरक्षा प्रणाली खरीदने जा रहा है। दिल्ली के सुरक्षा कवच की तीन परतें तैयार हो रही हैं। सबसे भीतर अमेरिकी प्रणाली, उसके बाहर भारत की ‘आकाश’ प्रणाली और उसके बाहर रूस की एस-400 प्रणाली। यह एक नया सामरिक गणित है, जो भारतीय विदेश नीति की दिशा को भी बताता है। पर इसमें दो राय नहीं कि भारत सामरिक दृष्टि से अब अमेरिकी खेमे में है।

अमेरिकी पहलकदमी

सन 2007 से अब तक भारत और अमेरिका के बीच करीब 20 अरब डॉलर के रक्षा सौदे हो चुके हैं। धीरे-धीरे भारत का झुकाव सायास या अनायास रूसी तकनीक के स्थान पर अमेरिकी तकनीक पर होता जा रहा है, जो महंगी है और जिसके साथ शर्तें लगी होती हैं। फिर भी वह विश्वसनीय है। रक्षा तकनीक में भारत ने अमेरिका, फ्रांस और इजरायल को अपना साझीदार बनाया है। हाल में लखनऊ में हुए डिफेंस एक्सपो-2020 में अमेरिका ने सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। एमएमआरसीए कार्यक्रम के तहत राफेल सौदा रद्द होने के बाद अब अमेरिका चाहता है कि उसके एफ-21 या एफए-18 विमान को भारत स्वीकार करे।

हाल में खबर है कि अमेरिका ने बोइंग के लड़ाकू विमान एफ-15 ईएक्स की पेशकश भी भारत से की है। नौसेना के लिए 57 लड़ाकू विमानों का सौदा भी शायद अमेरिका को मिलेगा। नौसेना के लिए 24 एमएच-60 हेलिकॉप्टर और थलसेना के लिए छह अपाचे अटैक हेलिकॉप्टरों की खरीद के सौदे पर सुरक्षा से जुड़ी कैबिनेट कमेटी की स्वीकृति मिलने ही वाली है और संभव है कि इन पंक्तियों के प्रकाशन तक मिल चुकी हो।

‘टू प्लस टू’ वार्ता

गत दिसंबर में दोनों देशों के बीच दूसरी ‘टू प्लस टू’ वार्ता हुई, जिसमें भारत की तरफ से राजनाथ सिंह और एस. जयशंकर तथा अमेरिका की तरफ से माइकेल पॉम्पियो और मार्क टी एस्पर शामिल हुए। हालांकि ‘टू प्लस टू वार्ता’ का दायरा काफी बड़ा है, पर मूलतः इसमें टकराव के बिंदुओं के समाधान की कोशिश की जाती है। इसमें रूस और ईरान के मुद्दे भी उठे हैं।

कुछ समय पहले दोनों देशों के बीच सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कम्युनिकेशंस, कंपैटिबिलिटी, सिक्योरिटी एग्रीमेंट (कोमकासा) होने के बाद सैनिक समन्वय और सहयोग की राहें खुली हैं। यह समझौता 10 साल के लिए हुआ है। इसके माध्यम से अमेरिकी नौसेना की सेंट्रल कमांड और भारतीय नौसेना के बीच संपर्क कायम हुआ है। भारत ने अपना एक अटैशे (प्रतिनिधि) बहरीन में नियुक्त किया है, जो अमेरिकी सेना के साथ समन्वय बनाएगा।

चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ पहल के समांतर अमेरिका ने ब्लू डॉट नेटवर्क (बीडीएन) पहल शुरू की है, जिसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए निजी निवेश को बढ़ावा देना है। भारत के साथ चारों देशों की चतुष्कोणीय सुरक्षा योजना ‘क्वाड’ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।

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