विधवाओं को खुदमुख्तार बनाती सीफिया हनीफ से मिलें, जिसे प्रतिष्ठित नीरजा भनोट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया

विधवाओं को खुदमुख्तार बनाती सीफिया हनीफ से मिलें, जिसे प्रतिष्ठित नीरजा भनोट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया

बेंगलुरु : केरल के पलक्कड जिले में पैदा हुई सीफिया सिर्फ 16 साल की थीं, जब उनका निकाह कर दिया गया। शादी के बाद वह पति के साथ बेंगलुरु आ गईं। जाहिर है, उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई। सीफिया कहती हैं, ‘हमारे समाज की यही परंपरा थी। मेरी सभी सहेलियों की शादी कम उम्र में हुई। हमें यह एहसास ही न था कि तालीम मुकम्मल करना कितना जरूरी होता है। हमारे वाल्दैन भी यही सोचते थे कि बेटी की शादी कर देना ही उसकी बेहतरी की गारंटी है।’ उम्र के 19वें पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते सीफिया की गोद में दो बच्चे आ गए थे। बेटों और पति के साथ खट्टे-मीठे अनुभव बटोरती सीफिया को तब तक जिंदगी से बहुत शिकायत नहीं थी। मगर जब वह 20 साल की हुईं, एक हादसे में पति का साथ हमेशा के लिए छूट गया। डूबने से उनके पति की मौत हो गई।

अपने बूते बेटों का मुस्तकबिल संवारने का इरादा

पति की मौत के बाद मां-बाप ने दबाव डालना शुरू कर दिया कि या तो वह घर में रहें या दूसरी शादी कर नई जिंदगी का आगाज करें। सीफिया के माता-पिता को यह गवारा न था कि जवान बेवा बेटी काम के लिए बाहर निकले और जमाना उसके किरदार को लेकर अफसाने गढ़ने लगा। मगर सीफिया को यह मंजूर न था। वह अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं। अपने बूते बेटों का मुस्तकबिल संवारने का इरादा बांध लिया था। पति के दोस्तों और परिचितों से बात करके ही वह बेंगलुरु आई थीं। बडे़ बेटे को माता-पिता के पास ही छोड़ दिया था। मगर मैजिस्टिक बस स्टॉप पर जिंदगी तल्ख हकीकतों के साथ खड़ी थी। जिन दोस्तों के दिलासे और भरोसे पर सीफिया वहां पहुंची थीं, उन्होंने उन्हें रिसीव करना तो दूर, उनका फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। वह दो दिनों तक उसी बस स्टॉप पर अपने फैसले का हिसाब लगाती रहीं। उस बेबस वक्त में पाटी उनके लिए मसीहा बन गईं। पाटी खुद 22 साल की एक विधवा बेटी की मां थीं और सीफिया की पीड़ा देख पसीज उठीं।

विधवाओं की मदद का फैसला

पाटी ने अपने घर में सीफिया को पनाह दे दी। कुछ हाथ-पैर मारने के बाद उन्हें एक कॉल सेंटर में नौकरी भी मिल गई। नौकरी के दौरान केरल से पत्राचार कोर्स के जरिए उन्होंने 11वीं-12वीं की अपनी पढ़ाई पूरी की। पाटी की ममता से अभिभूत सीफिया कहती हैं, ‘वह मुझमें हमेशा अपनी बेटी देखती थीं। मैं जब नौकरी पर जाती, वह मेरे बेटे का ख्याल रखतीं और इस एवज में उन्होंने एक पैसा नहीं लिया।’ नौकरी ने सीफिया में एक आत्मविश्वास तो भर दिया था, मगर बडे़ बेटे से दूरी उन्हें कचोटती रहती थी। आखिर वह भी तीन साल का था। उन्होंने गांव लौटने का फैसला किया। लौटते वक्त पाटी ने उन्हें कई सौगातें दीं, मगर उनकी एक नसीहत सीफिया के आने वाले कल का आधार बनी। पाटी ने उनसे कहा था- कभी किसी मुसीबतजदा की उपेक्षा मत करना। गांव लौटने के बाद सीफिया को एक स्थानीय हॉस्पिटल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई। साथ ही उन्होंने बीए-साहित्य (पत्राचार) में दाखिला ले लिया। सीफिया को अब उन विधवाओं की तकलीफें ज्यादा परेशान करती थीं, जिनके पास न कोई तालीम थी और न ही इतने संसाधन कि वे जिंदगी की दुश्वारियों का मुकाबला कर सकें। उन्होंने ऐसी विधवाओं की मदद का फैसला किया।

अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा लोकोपकार पर खर्च

अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा वह लोकोपकार पर खर्च करने लगीं। शुरू-शुरू में उन्होंने पांच बेसहारा बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाया। इसके साथ ही सीफिया ने एक फेसबुक पेज बनाया और अपनी गतिविधियों को उस पर साझा करना शुरू कर दिया। उन्हें इस पेज के जरिए काफी माली मदद मिली। इस राशि से उन्होंने विधवाओं और उन परिवारों की सहायता करनी शुरू कर दी, जिनके कमाने वाले किसी दुर्घटना का शिकार होकर हमेशा के लिए बिस्तर पर आ गए थे। मगर इस पूरी कवायद में सीफिया ने पढ़ाई का दामन कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने बीएड के बाद सोशल वर्क में एमए के साथ-साथ लोक-प्रशासन में डिप्लोमा कोर्स भी किया। इन दिनों वह एमफिल की तैयारी में जुटी हैं। सीफिया के प्रयासों से 100 से ज्यादा विधवाएं खुदमुख्तार बन चुकी हैं और लगभग 600 परिवारों का भला हुआ है। पिछले महीने उन्हें प्रतिष्ठित नीरजा भनोट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। सीफिया सचमुच एक मिसाल हैं।

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