दिल्ली में शिवा-जुल्फिकार-त्यागी एक साथ काम करते थे, फिर कपिल मिश्रा जैसे दंगाई आ गए

मुकुल सिंह चौहान

भीड़ जब हिंसक हो जाती है तो वो इंसान नहीं रहती उसकी इंसानियत खत्म हो जाती है, सारी गणित बस नुकसान करने तक सीमित हो जाती है। शायद दिमाग काम करना बंद कर देता है वरना प्यार से रहने वाले लोग किसी नेता या दंगाई के भड़का देने से भड़क कैसे सकते हैं?

इस तस्वीर को देखिये और सोचिये की अभी भयानक और किसी भीड़ की कुंठा का शिकार ये तस्वीर कभी कितनी खूबसूरत रही होगी। यही तस्वीर कभी भारत की गंगा जमुनी तहज़ीब का जीता जागता प्रमाण रही होगी। यही तस्वीर कभी किसी विदेशी को भारत की संस्कृति समझाने का उदाहरण रही होगी।

तस्वीर जिसमें शिवा और त्यागी की दूकान के बीच में ज़ुल्फ़िकार की दुकान है, तस्वीर जिसमें कभी ज़ुल्फ़िकार त्यागी तो कभी शिवा ज़ुल्फ़िकार की दुकान में चाय पीते होंगे और अपने सुख दुख बाँटते होंगे।

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आज ये तस्वीर इस बात की गवाही दे रही है की उन्मादी भीड़ कितनी खतरनाक होती है वो प्यार और भाईचारे जैसे शब्दों से कोसों दूर हो जाती है। उन्मादी भीड़ को लोगों के लहू का रंग इंद्रधनुषी लगने लगता है। उसे ये खून अपनी कुंठा की प्यास को बुझाने का जरिया लगने लगता है। ये भीड़ इतनी खतरनाक होती है की इसे किसीकी जान लेने में एक पल नहीं लगता ये भीड़ एक शब्द में ‘हत्यारी’ होती है।

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इसी हत्यारी भीड़ ने अब तक दिल्ली में 1 हेड कांस्टेबल समेत 16 अन्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इसी हत्यारी भीड़ ने कितने ही घरों के चराग बुझा दिए कितनी माओं की गोद सूनी कर दी, कितनी पत्नियों को बेवा कर दिया कितने ही घरों की रोज़ी रोटी छीन ली।

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दिल्ली के हालात सामान्य होने तक ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें आनी हैं पर उम्मीद पर दुनिया कायम है तो हम भी उम्मीद करते हैं की ये तस्वीर आखिरी हो। शिवा, ज़ुल्फ़िकार के यहां फिर से चाय पिए और ज़ुल्फ़िकार, त्यागी के यहां जाकर अपने सुख दुःख बांटे।

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