जन्मशती विशेषः मानवीय करुणा और समरसता में भीगी फणीश्वरनाथ रेणु की चर्चित कहानी- ठेस

बिहार के औराही हिंगना (अररिया) में जन्मे फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती 4 मार्च से आरंभ हो रही है। अपने पहले ही उपन्यास ‘मैला आंचल’ से उन्हें ख्याति मिल गई। उन्हें हिंदी में आंचलिक कथा की नींव रखने का सम्मान प्राप्त है। स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने और नेपाली क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने वाले रेणु बाद के दिनों में भी लेखन के साथ जनांदोलनों में हिस्सा लेते रहे।

उनकी कहानी ‘मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ ने भी न केवल पाठकों का मन मोहा बल्कि उस पर यादगार फिल्म भी बनी जिसे बहुत सराहा गया। उन्होंने परती परिकथा, पंचलैट, लालपान की बेगम और रसप्रिया जैसी कालजयी रचनाएं भी कीं। रेणु का समग्र लेखन और जीवन लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समानता के मूल्यों पर आधारित न्यायप्रिय समाज के निर्माण पर केंद्रित था। प्रेम, मानवीय करुणा और समरसता से सराबोर रेणु का साहित्य सांप्रदायिकता के जहर से बचाने और समाज को एक सूत्र में बांधने वाला रहा है। उनकी कई रचनाओं में से एक कहानी- ठेस हम यहां अपने पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं।

ठेस

खेती-बारी के समय गांव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगार’ समझते हैं। इसलिए मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाता सिरचन को। क्या होगा, उसको बुला कर? दूसरे मजदूर खेत पहुंच कर एक-तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा। तौल- तौल कर पांव रखता हुआ, धीरे-धीरे। मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।

आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था जब उसकी मड़ैया के पास बड़े-बड़े बाबू लोगों की सवारियां बंधी रहती थीं। लोग पूछते ही नहीं थे, खुशामद भी करते थे। सिरचन भाई, अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गई है सारे इलाके में। एक दिन भी समय निकाल कर चलो।

कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से। सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवा कर भेज दो। मुझे याद है। मां जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, ‘भोग क्या-क्या लगेगा?’ मां हंस कर कहती, ‘जा-जा, बेचारा मेरे काम में पूजा-भोग की बात नहीं उठाता कभी।’ ब्राह्मण टोली के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को एक बार मेरे सामने ही बेपानी कर दिया था सिरचन ने। ‘तुम्हारी भाभी नाखून से खांट कर तरकारी परोसती है। इमली का रस साल कर कढ़ी तो हम कहार-कुम्हारों की घरवाली बनाती हैं। तुम्हारी भाभी ने कहां से बनाईं।’

इसलिए सिरचन को बुलाने से पहले मैं मां को पूछ लेता। सिरचन को देखते ही मां हुलस कर कहती, ‘आओ सिरचन। आज नेनू मथ रही थी, तो तुम्हारी याद आई। घी की डाड़ी (खखोरन) के साथ चूड़ा तुमको बहुत पसंद है न। बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है। उसकी ननद रूठी हुई है, मोथी के शीतल पाटी के लिए।’

सिरचन अपनी पनियायी जीभ को संभाल कर हंसता। ‘घी की सुगंध सूंघ कर आ रहा हूं काकी। नहीं तो इस शादी-ब्याह के मौसम में दम मारने की भी छुट्टी कहां मिलती है?’ सिरचन जाति का कारीगर है। मैंने घंटों बैठ कर उसके काम करने के ढंग को देखा है। एक-एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जातां से उसकी कुच्ची बनाता। फिर कुच्चियों को रंगने से लेकर सुतली सुलझाने में पूरा दिन समाप्त। काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी कि गेंहुअन सांप की तरह फुफकार उठता, ‘फिर किसी दूसरे से करवा लीजिए काम। सिरचन मुंहजोर है, कामचोर नहीं।’

बिना मजदूरी के पेट भर भात पर काम करने वाला कारीगर। दूध में कोई मिठाई न मिले, तो कोई बात नहीं। किंतु बात में जरा भी झाल वह नहीं बर्दाश्त कर सकता। सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं। तली-बघारी हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध, इन सब का प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ। दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा। खाने-पीने में चिकनाई की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म। काम अधूरा रख कर उठ खड़ा होगा, ‘आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा-सा रह गया है। किसी दिन आ कर पूरा कर दूंगा।’ ‘किसी दिन’ माने कभी नहीं।

मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बांस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी-टोपी तथा इसी तरह के बहुत-से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गांव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गांव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग। बेकाम का काम, जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई जरूरत नहीं। पेट-भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना-धुराना कपड़ा दे कर विदा करो। वह कुछ भी नहीं बोलेगा।

कुछ भी नहीं बोलेगा, ऐसी बात नहीं। सिरचन को बुलाने वाले जानते हैं। सिरचन बात करने में भी कारीगर है। महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी सिरचन की बात सुन कर तिलमिला उठी थी। ठहरो, मैं मां से जा कर कहती हूं। इतनी बड़ी बात।’ ‘बड़ी बात ही है बिटिया। बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिला कर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी मां ही कर सकती है बबुनी।’ सिरचन ने मुस्कुरा कर जवाब दिया था।

उस बार मेरी सबसे छोटी बहन की विदाई होने वाली थी। पहली बार ससुराल जा रही थी मानू। मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को खत लिख कर चेतावनी दे दी है। ‘मानू के साथ मिठाई की पतीली न आए, कोई बात नहीं। तीन जोड़ी फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतल पाटियों के बिना आएगी मानू तो…।’ भाभी ने हंस कर कहा, ‘बैरंग वापस।’ इसलिए एक सप्ताह से पहले से ही सिरचन को बुला कर काम पर तैनात करवा दिया था मां ने। ‘देख सिरचन, इस बार नई धोती दूंगी। असली मोहर छाप वाली धोती। मन लगा कर ऐसा काम करो कि देखने वाले देख कर देखते ही रह जाएं।’

पान-जैसी पतली छुरी से बांस की तीलियों और कमानियों को चिकनाता हुआ सिरचन अपने काम में लग गया। रंगीन सुतलियों से झब्बे डाल कर वह चिक बुनने बैठा। डेढ़ हाथ की बिनाई देख कर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनी। मंझली भाभी से नहीं रहा गया। परदे के आड़ से बोलीं, ‘पहले ऐसा जानती कि मोहर छाप वाली धोती देने से ही अच्छी चीज बनती है तो भैया को खबर भेज देती।’

व्यस्त सिरचन के कानों में बात पड़ गई। बोला, ‘मोहर छाप वाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया। मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है। मानू दीदी का दूल्हा अफसर आदमी है।’ मंझली भाभी का मुंह लटक गया। मेरे चाची ने फुसफुसा कर कहा, ‘किससे बात करती है बहू? मोहर छाप वाली धोती नहीं, मूंगिया लड्डू। बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी। देखती है न।’

दूसरे दिन चिक की पहली पांति में सात तारे जगमगा उठे, सात रंग के। सतभैया तारा। सिरचन जब काम में मगन होता है तो उसकी जीभ जरा बाहर निकल आती है, होठ पर। अपने काम में मगन सिरचन को खाने-पीने की सुध नहीं रहती। चिक में सुतली के फंदे डाल कर अपने पास पड़े सूप पर निगाह डाली। चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला। मैंने लक्ष्य किया, सिरचन की नाक के पास दो रेखाएं उभर आईं। मैं दौड़कर मां के पास गया। ‘मां, आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है, सिर्फ चिउरा और गुड़?’ मां रसोईघर में अंदर पकवान आदि बनाने में व्यस्त थी। बोली, ‘मैं अकेली कहां-कहां क्या-क्या देखूं। अरी मंझली, सिरचन को बुंदिया क्यों नहीं देती?’ ‘बुंदिया मैं नहीं खाता, काकी।’ सिरचन के मुंह में चिउरा भरा हुआ था। गुड़ का ढेला सूप के किनारे पर पड़ा रहा, अछूता।

मां की बोली सुनते ही मंझली भाभी की भौंहें तन गईं। मुट्ठी भर बुंदिया सूप में फेंक कर चली गई। सिरचन ने पानी पी कर कहा, ‘मंझली बहूरानी अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोल कर बांटती हैं क्या?’ बस, मंझली भाभी अपने कमरे में बैठकर रोने लगी। चाची ने मां के पास जा कर लगाया, ‘छोटी जाति के आदमी का मुंह भी छोटा होता है। मुंह लगाने से सिर पर चढ़ेगा ही। किसी के नैहर-ससुराल की बात क्यों करेगा वह?’ मंझली भाभी मां की दुलारी बहू है। मां तमक कर बाहर आई, ‘सिरचन, तुम काम करने आए हो, अपना काम करो। बहुओं से बतकुट्टी करने की क्या जरूरत? जिस चीज की जरूरत हो, मुझसे कहो।’

सिरचन का मुंह लाल हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बांस में टंगे हुए अधूरे चिक में फंदे डालने लगा। मानू पान सजाकर बाहर बैठक खाने में भेज रही थी। चुपके से पान का एक बीड़ा सिरचन को दिया और इधर-उधर देख कर कहा, ‘सिरचन दादा, काम-काज का घर। पांच तरह के लोग पांच किस्म की बात करेंगे। तुम किसी की बात पर कान मत दो।’

सिरचन ने मुस्कुरा कर पान का बीड़ा मुंह में ले लिया। चाची अपने कमरे से निकल रही थी। सिरचन को पान खाते देख कर अवाक हो गई। सिरचन ने चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देख कर कहा, ‘छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया का गमकौआ जर्दा तो खिलाना। बहुत दिन हुए…।’

चाची कई कारणों से जली-भुनी रहती थी सिरचन से। गुस्सा उतारने का ऐसा मौका फिर नहीं मिल सकता। झनकती हुई बोली, ‘मसखरी करता है? तुम्हारी चढ़ी हुई जीभ में आग लगे। घर में भी पान और गमकौआ जर्दा खाते हो? चटोर कहीं के।’ मेरा कलेजा धड़क उठा, यत्परो नास्ति। बस, सिरचन की उंगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए। मानो, कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा पान को मुंह में घुलाता रहा। फिर, अचानक उठ कर पिछवाड़े पीक थूक आया। अपनी छुरी, हंसियां वगैरह समेट-संभाल कर झोले में रखे। टंगी हुई अधूरी चिक पर एक निगाह डाली और हनहनाता हुआ आंगन के बाहर निकल गया।

चाची बड़बड़ाई, ‘अरे बाप रे बाप। इतनी तेजी। कोई मुफ्त में तो काम नहीं करता। आठ रुपए में मोहर छाप वाली धोती आती है। इस मुंहझौंसे के मुंह में लगाम है, न आंख में शील। पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चिक मिलेंगी। बांतर टोली की औरतें सिर पर गट्ठर ले कर गली-गली मारी फिरती हैं।’

मानू कुछ नहीं बोली। चुपचाप अधूरी चिक को देखती रही। सातों तारे मंद पड़ गए। मां बोली, ‘जाने दे बेटी। जी छोटा मत कर मानू। मेले से खरीद कर भेज दूंगी।’ मानू को याद आया, विवाह में सिरचन के हाथ की शीतलपाटी दी थी मां ने। ससुराल वालों ने न जाने कितनी बार खोल कर दिखलाया था पटना और कलकत्ता के मेहमानों को। वह उठ कर बड़ी भाभी के कमरे में चली गई। मैं सिरचन को मनाने गया।

देखा, एक फटी शीतलपाटी पर लेट कर वह कुछ सोच रहा है। मुझे देखते ही बोला, बबुआ जी। अब नहीं। कान पकड़ता हूं, अब नहीं। मोहर छाप वाली धोती ले कर क्या करूंगा? कौन पहनेगा? ससुरी खुद मरी, बेटे-बेटियों को ले गई अपने साथ। बबुआजी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है। इस शीतलपाटी को छू कर कहता हूं, अब यह काम नहीं करूंगा। गांव भर में तुम्हारी हवेली में मेरी कदर होती थी। अब क्या?’ मैं चुपचाप वापस लौट आया। समझ गया, कलाकार के दिल में ठेस लगी है। वह अब नहीं आ सकता।

बड़ी भाभी अधूरी चिक में रंगीन छींट की झालर लगाने लगी, ‘यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू?’ मानू कुछ नहीं बोली, बेचारी। किंतु, मैं चुप नहीं रह सका, ‘चाची और मंझली भाभी की नजर न लग जाए इसमें भी।’ मानू को ससुराल पहुंचाने मैं ही जा रहा था। स्टेशन पर सामान मिलाते समय देखा, मानू बड़े जतन से अधूरे चिक को मोड़कर लिए जा रही है अपने साथ। मन-ही-मन सिरचन पर गुस्सा हो आया। चाची के सुर में सुर मिला कर कोसने को जी हुआ। कामचोर, चटोर।

गाड़ी आई। सामान चढ़ाकर मैं दरवाजा बंद कर रहा था कि प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हुए सिरचन पर नजर पड़ी। ‘बबुआजी।’ उसने दरवाजे के पास आ कर पुकारा। ‘क्या है?’ मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर झिड़की के स्वर में कहा। सिरचन ने पीठ पर लादे हुए बोझ को उतार कर मेरी ओर देखा, ‘दौड़ता आया हूं, दरवाजा खोलिए। मानू दीदी कहां हैं? एक बार देखूं।’

मैंने दरवाजा खोल दिया। ‘सिरचन दादा।’ मानू इतना ही बोल सकी। खिड़की के पास खड़े हो कर सिरचन ने हकलाते हुए कहा, ‘यह मेरी ओर से है। सब चीज है दीदी। शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी, कुश की।’ गाड़ी चल पड़ी। मानू मोहर छाप वाली धोती का दाम निकाल कर देने लगी। सिरचन ने जीभ को दांत से काट कर, दोनों हाथ जोड़ दिए। मानू फूट-फूट रो रही थी। मैं बंडल को खोल कर देखने लगा। ऐसी कारीगरी, ऐसी बारीकी, रंगीन सुतलियों के फंदों का ऐसा काम, पहली बार देख रहा था।

(कहानी, कविता हिंदी समय से साभार)

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