Video: असदउद्दीन ओवैसी के हाथों सलमान खुर्शीद ने कराया अपनी किताब का विमोचन,देखिए

नई दिल्ली: काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री सलमान खुर्शीद की किताब ‘विज़िबिल मुस्लिम, इनविजिबिल सिटीज़न: अंडरस्टैंडिंग इस्लाम इन इंडियन डेमोक्रेसी’ के विमोचन के मौके पर देश की कई बड़ी हस्तियाँ मौजूद रही।

लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी, बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली, पत्रकार सीमा चिश्ती और प्रोफेसर हिलाल अहमद शामिल हुए थे।

सलमान खुर्शीद ने कहा कि, “मेरा मानना है कि दिल्ली में तो डर का माहौल नहीं है, लेकिन हां छोटे शहरों और गांवों में बुरा हाल है। ऐसे में हर भारतीय की जिम्मेदारी है कि इस डर के माहौल को खत्म करे।” उन्होंने कहा कि, “अगर लोकतंत्र में अगर असहमति की गुंजाइश खत्म हो जाएगी तो लोकतंत्र पर ही सवाल उठेंगे। किसी असहमति पर विचारों का आदान-प्रदान न होना लोकतंत्र के लिए त्रासदी है।

इस मौके पर असदउद्दीन ओवैसी ने कहा कि, “सिर्फ इसलिए कि किसी पार्टी को अधिक सीटें आ गई हैं तो राज्य का मुख्यमंत्री यह बोलेगा कि ‘ठोक दो’, वे संविधान की शपथ लेते हैं या हिटलर की आत्मकथा मीनकाम्फ की। कानून के राज और कानून द्वारा राज में फर्क है। यूपी में हो रहे एनकाउंटर के मामलों में मानवाधिकार आयोग ने सख्त आदेश दिए हैं। यूपी के मुख्यमंत्री कहते हैं कि हम हर अवैध गतिविधि को लोकतांत्रिक तरीके से खत्म करेंगे। लेकिन जैसे ही एक ब्राह्मण इसका शिकार हुआ तो मामला विवादित हो गया।“

ओवैसी ने कहा, “मैं एक मुख्यमंत्री के रूप में ऐसी भाषा का उपयोग नहीं कर सकता। जब कोई सीएम इस भाषा का उपयोग करता है, तो आप पुलिस बल को लोगों को मारने के लिए कह रहे हैं। लेकिन जब एक ऊंची जाति के व्यक्ति को गोली मार दिया जाता है, तब यूपी सरकार को क्या हो जाता है।” इस पर यूपी के सीएम अजय बिष्ट का समर्थन करते हुए नलिन कोहली ने कहा, “अगर आप इसका दूसरा रुख देखेंगे तो इसका मतलब है कि अगर आप अपराधी हैं, तो आपको डरने की बहुत जरूरत है।”

टीवी चैनलों पर कटाक्ष करते हुए ओवैसी ने चुटकी लेते हुए कहा, “उन्हें “दाढ़ी और टोपी वाला आदमी पसंद है क्योंकि यह उनकी टीआरपी के लिए अच्छा है।” यह पूछे जाने पर कि क्या वह एक मुस्लिम नेता हैं, उन्होंने पलटकर कहा, “मैं एक मुस्लिम नेता नहीं हूं … लोग गलत तरीके से मानते हैं कि मैं एक मुस्लिम नेता हूं। अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों के लिए काम करना मेरे जीवन का संघर्ष है।”

हालांकि इस परिचर्चा में शामिल पैनलिस्टों की और अधिक राय ली जा सकती थी, विशेष रूप से सीमा चिश्ती और हिलाल अहमद की, लेकिन चौबे ने फैसला किया कि मंच पर मौजूद लोगों की तुलना में उन्हें अधिक बोलना चाहिए।

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