
✒ डाक्टर मुहम्मद नजीब क़ासमी
हकीम लुक़मान (रहमतुल्लाह अलैह) का नाम तो बचपन से सुनते चले आ रहे हैं, क्योंकि अल्लाह तआला ने उनके नाम से क़ुरान करीम में एक सूरत नाज़िल फरमाई है। जिसकी क़यामत तक तिलावत होती रहेगी इंशाअल्लाह। लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि हज़रत लुक़मान कौन थे। अल्लाह तआला ने उनके नसब, खानदान और ज़माना के बारे में तो अपने कलाम पाक में कोई ज़िक्र नहीं किया, लेकिन उनके हकीमाना अकवाल (बातें) का ज़िक्र फरमाया है। पुरानी तारिख (इतिहास) इस बात की गवाही देती है कि इस नाम का एक शख्स सरज़मीन अरब पर मौजूद था, लेकिन उनकी शख्सियत और नसब के बारे में इख्तिलाफ पाया जाता है। एक रिवायत के मुताबिक वह हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के भांजे या खालाज़ाद भाई, जबकि दूसरी रिवायत से हज़रत दाउद अलैहिस्सलाम के हमज़माना मालूम होते है।
अकसर तारीखदाँ (इतिहासकार) की राय है कि हकीम लुक़मान अफरिकी नसल थे और अरब में उनकी आम्द (आगमन) बहैसियत गुलाम हुई थी। उलमा का कहना है कि हकीम लुक़मान नबी नहीं थे और न उन पर वही नाज़िल हुई, क्योंकि क़ुरान और हदीस में किसी भी जगह कोई एसा इशारा मौजूद नहीं है जो हकीम लुक़मान के नबी या रसूल होने पर दलालत करता हो। गरज़ ये कि अल्लाह तआला ने हकीम लुक़मान को नबूवत अता नहीं की मगर हिकमत और दानाई अता फरमाई। रिवायात में आता है कि आप सूरत और शकल के एतेबार से अच्छे नहीं थे, जैसा कि मशहूर ताबई हज़रत सईद बिन मुसैयिब (रमतुल्लाह अलैह) ने एक हबशी से कहा था कि तु इस बात से दिलगीर न हो कि तु काला हबशी है, इसलिए कि हबशियों में तीन आदमी दुनिया के बेहतरीन इंसान हुए हैं। हज़रत बिलाल हबशी (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत ऊमर फारूक (रज़ियल्लाहु अन्हु) का गुलाम मेहजा और हकीम लुक़मान (रहमतुल्लाह अलैह)। गरज़ ये कि हकीम लुक़मान के हालाते ज़िन्दगी और ज़माना में इख्तिलाफ के बावजूद पूरी दुनिया उनको एक मशहूर शख्सियत तसलीम करती है। जाहेलियत के चंद कवियों ने भी इनका तजकिरा किया है।
अल्लाह तआला ने सूरह लुक़मान में हज़रत लुक़मान की उन क़ीमती नसीहतों का ज़िक्र फरमाया है जो उन्होंने अपने बेटे को मुखातब करके बयान फरमाई थीं। यह हकीमाना अक़वाल अल्लाह तआला ने इसलिए क़ुरान करीम में नक़ल किए हैं ताकि क़यामत तक आने वाले इंसान उनसे फायदा उठाकर अपनी ज़िन्दगी को खूब से खूबतर बना सकें और एक अच्छा मुआशरा (समाज) वजूद में आसके।