सावरकर ने अंग्रेजी सरकार से लगाई थी माफी की गुहार- मुझे रिहा कर दिया गया तो रहूंगा वफादार

एक ऐसे समय में जब उग्र हिंदू राष्ट्रवाद के एजेंडे पर चलने वाली पार्टी सत्ता में हो, हिंदुत्व और उसके प्रणेता वीडी सावरकर पर विचार करना ज़रूरी लगता है. सावरकर के विचार क्या थे? आज़ादी की लड़ाई में उनका योगदान क्या था? स्वतंत्रता आंदोलन में सावरकर की क्या भूमिका थी, जिसके चलते उन्हें वीर सावरकर की उपाधि से नवाज़ा गया, यह सवाल बेहद अहम हैं. भारत में राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का परस्पर अटूट संबंध है. राष्ट्रीयता भारत के स्वाधीनता आंदोलन की वह भावना थी, जो पूरे आंदोलन के मूल में थी. इसी दौरान हिंदू राष्ट्रीयता अथवा हिंदू राष्ट्रवाद का विचार गढ़ा गया.

सावरकर उस हिंदुत्व के जन्मदाता हैं जो हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने वाला साबित हुआ. मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र के सिद्धांत की तरह ही उनके हिंदुत्व ने भी अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति में सहायता की.

सावरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वह आदि विचारक हैं जो हिंदू-मुसलमान को दो अलग-अलग राष्ट्र मानते हैं. तब से बाद के वर्षों में भी संघ अपनी हिंदू राष्ट्र की कल्पना और हिंदू राष्ट्रवाद के विचार पर टिका हुआ है. इसके उलट संघ भारत-पाकिस्तान बंटवारे के लिए कांग्रेस, महात्मा गांधी, नेहरू को कोसता भी है. मौजूदा दौर में हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए वे लोग सबसे बड़े ‘गद्दार’ हैं जो सांप्रदायिकता के विरोध में हैं, जो सेक्युलर विचार को मानने वाले हैं. जैसा कि प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि वे ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ हैं, यदि ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ होना गर्व की बात है तो गर्व एक समस्या खड़ी करता है. इसी तरह मुस्लिम राष्ट्रवादी, सिख राष्ट्रवादी, इसाई राष्ट्रवादी होंगे. इतने सारे राष्ट्रवादी ज़ाहिर है कि भारतीय राष्ट्रवाद के मुक़ाबले कई टुकड़ियों में एक ख़तरे के रूप में खड़े होंगे. इस हिंदू राष्ट्रवाद में गर्व करने जैसा क्या है जो भारत जैसे विविधता वाले राष्ट्र को एक ही ढर्रे पर ले जाने की वकालत करता है.

हिंदू राष्ट्रवादियों ने आज़ादी की लड़ाई के वक़्त भारतीय सेनानियों का साथ देने की बजाय अंग्रेज़ों के साथ हो गए और अंग्रेज़ों की तरफ से उन पर कार्रवाई न करने का अभयदान मिला. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी और जापान की मदद से भारत को आज़ाद कराने का प्रयास किया था. इस दौरान ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मदद करने की जगह ब्रिटिश शासकों का साथ दिया. सावरकर ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भारत में सैनिकों की भर्ती में मदद की. आगे चलकर सावरकर ने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाया जो हिंदू-मुस्लिमों में भेद पैदा करने में सहायक हुआ.

कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रवादी मानने से इनकार करते हुए लिखा है कि सावरकर को दो राष्ट्र सिद्धांत से कोई आपत्ति नहीं थी। सावरकर का एक रिकॉर्ड कांग्रेस ने शेयर किया है, जिसमें सावरकर ने कहा है, दो-राष्ट्र सिद्धांत पर श्री जिन्ना के साथ मेरा कोई झगड़ा नहीं है। हम, हिंदू, अपने आप में एक राष्ट्र हैं और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं। यानी सावरकर भी हिन्दू- मुसलमान के बीच फूट डालो और दो देश बनाकर राज करो सिद्धांत के सहायक रहे हैं, जबकि संघ और उसके समर्थक इससे इनकार करते रहे हैं। सावरकर पर इतिहासकार भी बंटे हुए हैं।

प्रकाशन विभाग से साल 1975 में प्रकाशित आरसी मजूमदार की किताब पीनल सेटलमेंट्स इन द अंडमान्स के मुताबिक साल 1911 में जब सावरकर को क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते कालेपानी की सजा सुनाई गई थी और अंडमान-निकोबार के सेलुलर जेल में भेजा गया था, तब सावरकर ने सजा शुरू होने के कुछ महीने बाद ही अंग्रेजी हुकूमत से रिहाई की गुहार लगाई थी। शुरू में सावरकर ने 1911 में अंग्रेजी सरकार को चिट्ठी लिखी, बाद में सावरकर ने जेल सुप्रीटेंडेंट के जरिए 1913 और 1921 में याचिका दाखिल की थी। अपनी याचिका में सावरकर ने साफ तौर पर लिखा था कि मुझे रिहा कर दिया गया तो मैं भारत की आजादी की लड़ाई छोड़ दूंगा और उपनिवेशवादी सरकार (अंग्रेजी हुकूमत) के प्रति वफादार रहूंगा।

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और प्रेस काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने भी सावरकर पर अपने विचार प्रकट किए हैं। उन्होंने लिखा है, सावरकर 1910 ईस्वी तक ही राष्ट्रवादी थे। यह वह दौर था जब वो गिरफ्तार किए गए थे और कालेपानी की सजा पाई थी। बतौर काटजू, जेल में 10 साल गुजारने के बाद अंग्रेजों की तरफ से सावरकर को प्रस्ताव मिला था कि वो सरकार के सहयोगी बन जाएं जिसे सावरकर ने स्वीकार कर लिया था। उन्होंने लिखा है कि सेललुलर जेल से छूटने के बाद क्रांतिकारी सावरकर हिन्दू साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के काम में जुट गए थे।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘कई लोग मानते हैं कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे. लेकिन सच क्या है? सच ये है ब्रिटिश राज के दौरान कई राष्ट्रवादी गिरफ्तार किए गए. जेल में ब्रिटिश अधिकारी उन्हें प्रलोभन देते थे कि या वे उनके साथ मिल जाएं या पूरी ज़िंदगी जेल में बिताएं. तब कई लोग ब्रिटिश शासन का सहयोगी बन जाने के लिए तैयार हो जाते थे. इसमें सावरकर भी शामिल हैं.’ जस्टिस काटजू कहते हैं, ‘दरअसल, सावरकर केवल 1910 तक राष्ट्रवादी रहे. ये वो समय था जब वे गिरफ्तार किए गए थे और उन्हें उम्र कैद की सज़ा हुई. जेल में करीब दस साल गुजारने के बाद, ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके सामने सहयोगी बन जाने का प्रस्ताव रखा जिसे सावरकर ने स्वीकार कर लिया. जेल से बाहर आने के बाद सावरकर हिंदू सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का काम करने लगे और एक ब्रिटिश एजेंट बन गए. वह ब्रिटिश नीति ‘बांटो और राज करो’ को आगे बढ़ाने का काम करते थे.’

जस्टिस काटजू लिखते हैं, ‘दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे. उन्होंने तब इस नारे को बढ़ावा दिया, ‘राजनीति को हिंदू रूप दो और हिंदुओं का सैन्यीकरण करो’. सावरकर ने भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा युद्ध के लिए हिंदुओं को सैन्य प्रशिक्षण देने की मांग का भी समर्थन किया. इसके बाद जब कांग्रेस ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की तो सावरकर ने उसकी आलोचना की. उन्होंने हिंदुओं से ब्रिटिश सरकार की अवज्ञा न करने को कहा. साथ ही उन्होंने हिंदुओं से कहा कि वे सेना में भर्ती हों और युद्ध की कला सीखें. क्या सावरकर सम्मान के लायक हैं और उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहा जाना चाहिए? सावरकर के बारे में ‘वीर’ जैसी बात क्यों? वह तो 1910 के बाद ब्रिटिश एजेंट हो गए थे.’

शम्सुल इस्लाम वीर सावरकर के हिंदुत्व की चर्चा करते हुए लिखते हैं, ‘वास्तव में आरएसएस ‘वीर’ सावरकर द्वारा निर्धारित विचारधारा का पालन करता है. यह कोई राज़ नहीं है कि ‘वीर’ सावरकर अपने पूरे जीवन में जातिवाद और मनुस्मृति की पूजा के एक बड़े प्रस्तावक बने रहे. ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की इस प्रेरणा के अनुसार- ‘मनुस्मृति एक ऐसा धर्मग्रंथ है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सर्वाधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति रीति-रिवाज, विचार तथा आचरण का आधार हो गया है. सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक एवं दैविक अभियान को संहिताबद्ध किया है. आज भी करोड़ों हिंदू अपने जीवन तथा आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर आधारित हैं. आज मनुस्मृति हिंदू विधि है.’

नाथूराम गोडसे ने 1948 में महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी. पूरे महाद्वीप को हिला देने वाली इस हत्या के आठ आरोपी थे जिनमें से एक नाम वी डी सावरकर का भी था. हालांकि, उनके ख़िलाफ़ यह आरोप साबित नहीं हो सका और वे बरी हो गए. 1910-11 तक वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे. वे पकड़े गए और 1911 में उन्हें अंडमान की कुख्यात जेल में डाल दिया गया. उन्हें 50 वर्षों की सज़ा हुई थी, लेकिन सज़ा शुरू होने के कुछ महीनों में ही उन्होंने अंग्रेज़ सरकार के समक्ष याचिका डाली कि उन्हें रिहा कर दिया जाए. इसके बाद उन्होंने कई याचिकाएं लगाईं. अपनी याचिका में उन्होंने अंग्रेज़ों से यह वादा किया कि ‘यदि मुझे छोड़ दिया जाए तो मैं भारत के स्वतंत्रता संग्राम से ख़ुद को अलग कर लूंगा और ब्रिट्रिश सरकार के प्रति अपनी वफ़ादारी निभाउंगा.’ अंडमान जेल से छूटने के बाद उन्होंने यह वादा निभाया भी और कभी किसी क्रांतिकारी गतिविधि में न शामिल हुए, न पकड़े गए.

वीडी सावरकर ने 1913 में एक याचिका दाख़िल की जिसमें उन्होंने अपने साथ हो रहे तमाम सलूक का ज़िक्र किया और अंत में लिखा, ‘हुजूर, मैं आपको फिर से याद दिलाना चाहता हूं कि आप दयालुता दिखाते हुए सज़ा माफ़ी की मेरी 1911 में भेजी गई याचिका पर पुनर्विचार करें और इसे भारत सरकार को फॉरवर्ड करने की अनुशंसा करें. भारतीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रमों और सबको साथ लेकर चलने की सरकार की नीतियों ने संविधानवादी रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है. अब भारत और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति, अंधा होकर उन कांटों से भरी राहों पर नहीं चलेगा, जैसा कि 1906-07 की नाउम्मीदी और उत्तेजना से भरे वातावरण ने हमें शांति और तरक्की के रास्ते से भटका दिया था.’

अपनी याचिका में सावरकर लिखते हैं, ‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है. जब तक हम जेल में हैं, तब तक महामहिम के सैकड़ों-हजारें वफ़ादार प्रजा के घरों में असली हर्ष और सुख नहीं आ सकता, क्योंकि ख़ून के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता. अगर हमें रिहा कर दिया जाता है, तो लोग ख़ुशी और कृतज्ञता के साथ सरकार के पक्ष में, जो सज़ा देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है, नारे लगाएंगे.’

याचिका के अगले हिस्से में वे और भारतीयों को भी सरकार के पक्ष में लाने का वादा करते हुए लिखते हैं, ‘इससे भी बढ़कर संविधानवादी रास्ते में मेरा धर्म-परिवर्तन भारत और भारत से बाहर रह रहे उन सभी भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाएगा, जो कभी मुझे अपने पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखते थे. मैं भारत सरकार जैसा चाहे, उस रूप में सेवा करने के लिए तैयार हूं, क्योंकि जैसे मेरा यह रूपांतरण अंतरात्मा की पुकार है, उसी तरह से मेरा भविष्य का व्यवहार भी होगा. मुझे जेल में रखने से आपको होने वाला फ़ायदा मुझे जेल से रिहा करने से होने वाले होने वाले फ़ायदे की तुलना में कुछ भी नहीं है. जो ताक़तवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है. आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे.’

ऐसी गतिविधियों में लिप्त और दया की मांग करता हुआ ऐसा माफ़ीनामा डालने वाले सावरकर वीर कैसे कहे जा सकते हैं, जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के उलट अंग्रेज़ी फ़ौज के लिए भारतीयों की भर्ती में मदद की? सावरकर का योगदान यही है कि उन्होंने भारत में हिंदुत्व की वह विचारधारा दी जो लोकतंत्र के उलट एक धर्म के वर्चस्व की वकालत करती है.

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