
अमरीका के विदेश मंत्री ने पश्चिमी तट में ज़ायोनी काॅलोनियों के निर्माण को क़ानूनी बता कर ज़ायोनी प्रधानमंत्री को क़ानूनी कार्यवाही से बचाने की कोशिश की है।
पश्चिमी तट में काॅलोनियों के निर्माण को क़ानूनी बताने पर आधारित अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के ग़ैर क़ानूनी और शांति विरोधी बयान ने इन काॅलोनियों में रहने वाले ज़ायोनियों को फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ हमलों के लिए अधिक दुस्साहसी बना दिया है।
इसके साथ ही ज़ायोनी संसद ने भी फ़िलिस्तीनियों के अधिक क्षेत्रों को हड़पने के लिए कोशिशें तेज़ कर दी हैं। ऐसा लगता है कि ज़ायोनी शासन और पश्चिमी तट के अतिग्रहित इलाक़ों में रहने वाले ज़ायोनी इसी इंतेज़ार में थे कि ऐसा कोई बयान आए और वे तुरंत कार्यवाही शुरू कर दें।
जाॅन बोलटन को जब तक वाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद से नहीं हटा गया था, तब तक वे ज़ायोनी शासन की सेवा का दायित्व निभा रहे थे लेकिन उन्हें हटाए जाने के बाद अब माइक पोम्पियो उनकी जगह लेने की कोशिश कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि नेतनयाहू की चरमपंथी सरकार को मुफ़्त की सवारी कराके दूसरों से आगे बढ़ जाएं।
इस बात के मद्देनज़र कि नेतनयाहू अपने निर्धारित समय में सरकार बनाने में सफल नहीं हुए हैं और अब यह ज़िम्मेदारी उनके प्रतिद्वंद्वी यानी बेनी गेनेट्ज़ को दी गई है इस लिए ऐसा लगता है कि पोम्पियो के बयान का उद्देश्य नेतनयाहू की मदद करना था और इससे पता चलता है कि पोम्पियो और अमरीकी विदेश मंत्रालय, ज़ायोनी शासन के अंदर की धड़े बंदी में नेतनयाहू के नेतृत्व वाले चरमपंथी धड़े का समर्थन कर रहे हैं।
इसका एक कारण यह है कि अमरीका और अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन दोनों ही स्थानों पर चरमपंथी धड़े की सरकार है और दोनों के बीच वैचारिक रिश्ते पाए जाते हैं।
अलबत्ता एक और अहम कारण यह है कि नेतनयाहू और ट्रम्प दोनों का अंजाम, एक प्रकार से एक दूसरे से जुड़ा हुआ है इस लिए जिस तरह नेतनयाहू, अमरीका में ट्रम्प के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही को लेकर चिंतित हैं उसी तरह अमरीका में ट्रम्प के नेतृत्व में सत्तारूढ़ चरमपंथी धड़ा भी नेतनयाहू के ख़िलाफ़ मुक़द्दमे की ओर से चिंतित है।
इस बीच जो बात निश्चित है, वह यह है कि पोम्पियो, ट्रम्प के मंत्री मंडल के अन्य सदस्यों से अधिक इस बारे में चिंतित हैं और पश्चिमी तट में ज़ायोनी काॅलोनियों के निर्माण को वैध बताने पर आधारित उनका हालिया बयान, एक प्रकार से उनकी चिंता को ही दर्शाता है।
अलबत्ता पोम्पियो को अपने इस बयान की वजह से बहुत अधिक विरोध का सामना करना पड़ा है और यह बयान ट्रम्प सरकार के लिए काफ़ी महंगा साबित हुआ है।
इस प्रकार से कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के पश्चिमी सदस्य भी इसका समर्थन नहीं कर सके हैं। हालांकि पोम्पियो के बयान की निंदा के प्रस्ताव का मसौदा वीटो कर दिया गया लेकिन अमरीका इस बैठक में अकेला पड़ गया और परिषद के अन्य 14 सदस्यों ने अमरीका का विरोध किया।
क्षेत्रीय स्तर पर भी अमरीका के अरब घटक उसका साथ नहीं दे सके क्योंकि अमरीका का एक अरब घटक जाॅर्डन, इस बयान का निशाना बना है और इस बयान में जाॅर्डन के एक क्षेत्र को भी ज़ायोनी शासन में शामिल करने के लिए हरी झंडी दिखाई है।
साभार- पार्स टुडे हिन्दी
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