शाहीन बाग पर बातचीत का पहला दिन: नेतृत्व विहीन तो है, लेकिन बुद्धिहीन नहीं है सीएए विरोधी प्रदर्शन 

शाहीन बाग की पहचान बनी दादियों के रुख में सख्ती बरकरार है और उन्होंने साफ कह दिया है कि जब तक केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून वापस नहीं लेती, तब तक वह यहां से उठने वाली नहीं हैं। दादियों ने यह बात सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थों वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन से मंगलवार को कही। इन दोनों वकीलों ने प्रदर्शनकारियों से करीब दो घंटे तक बातचती की। बातचीत का दौर कल (गुरुवार को) भी जारी रहेगा।

बातचीत के दौरान 90 वर्ष की दादी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि, “वह यहां संविधान बचाने के लिए बैठी हैं और किसी चीज के लिए नहीं।” उन्हीं की उम्र की दूसरी दादी ने कहा, “प्रदर्शन की वजह से सिर्फ दो जगह के रास्ते बंद हैं, जबकि तीन तरफ के रास्ते तो पुलिस ने खुद बंद कर दिए हैं। इसलिए पहले पुलिस उन तीन रास्तों को खोले, फिर हमसे बात की जाए।” वहीं तीसरी दादी ने मांग की कि जामिया के छात्रों के खिलाफ जो ज्यादतियां हुई हैं, उसकी जांच कराई जाए और पुलिस के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। उनकी शिकायत थी कि पुलिसिया कार्रवाई में जामिया के तमाम छात्र जख्मी हुए हैं, लेकिन मोदी और शाह में से किसी ने भी इनके बारे में कोई चिंता जाहिर नहीं की।

मोदी शाह के खिलाफ गुस्सा जताते हुए उन्होंने यहां तक कहा, “हमने तो अंग्रेज़ों को भगा दिया, तो तुम क्या चीज़ हो।” दादी ने जहां शाहीन बाग और जामिया में हुई फायरिंग का जिक्र किया, वहीं यह भी याद दिलाया कि प्रदर्शनकारियों ने किस तरह बुर्का पहनकर आई गुंजन कपूर को सुरक्षा के साथ यहां से बाहर निकाला।

इस दौरान युवा प्रदर्शनकारियों ने बहुत गंभीरता से अपनी बात रखी। एक युवा लड़की ने मध्यस्थों से कहा कि, “कोर्ट ने आपको यहां हम से बात करने के लिए भेजा है और कोर्ट का यह कदम लोकतंत्र में हमारे भरोसे को और मजबूत करता है।” मध्यस्थों से बात करते हुए यह लड़की रो पड़ी, सने कहा, “हम सर्दी, बारिश में यहां बैठे रहे, लेकिन किसी ने हमसे हमारी हालत तक नहीं पूछी, और उलटा हमारे हमारे इस संघर्ष को बदनाम करने की कोशिश की गई कि हम यहां पैसे लेकर बैठे हैं।” इस लड़की ने कहा कि हम संविधान और गांधी के विचारों को बचाने के लिए सड़कों पर आए हैं और सड़क खुलवाने का रास्ता कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, इससे कहीं ज्यादा बड़ा मुद्दा संविधान का है जिसके लिए हम सड़कों पर हैं।

एक और लड़की ने कहा कि ट्रैफिक जाम की बात की जा रही है और इसकी वजह से हो रही परेशानियों की बात की जा रही है, लेकिन जिस परेशानी से हम दो-चार हैं उसकी बात नहीं की जा रही है।

वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े इस लड़की की बातचीत से काफी प्रभावित नजर आए। उन्होंने कहा कि, “आजादी लोगों के दिलों में बसती है।” एक और प्रदर्शनकारी ने कहा कि हम यहां बैठे हैं कि हमारी बात सुनी जाए, हम गोली चलाने के लिए नहीं बैठे हैं। उसने कहा कि यहां मीडिया को बाहर कर दिया लेकिन जो दिल्ली पुलिस वीडियोग्राफी कर रही है उसको क्यों नहीं रोका गया।

प्रदर्शनकारियों ने मध्यस्थों के सामने अपनी बात मजबूत तरीके से रखी। इससे पहले शाहीन बाग पहुंचने पर संजय हेगड़े और साधाना भारद्वाज ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक बात करने आए हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से बातचीत शुरु करने से पहले मीडिया को वहां से हटाने को कहा। लेकिन इस पूरी बातचीत में फिलहा कुछ ऐसा सामने नहीं आया जिससे किसी हल की तरफ बढ़ने के संकेत मिलते हों।

साधना रामचंद्र ने कहा कि वह सबके अधिकारों की रक्षा के पक्ष में है, जिसपर प्रदर्शनकारियों ने सहमति जताई, लेकिन जब उन्होंने कहा कि जैसे वह अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं वैसे दूसरों के भी अधिकार हैं, इस पर लोगों ने नाराजगी जताई। साधना भारद्वाज ने कहा कि, “हम ऐसा हल निकालना चाहते हैं कि जिसकी पुरी दुनिया में मिसाल दी जाए।”

कुल मिलाकर इस बिना चेहरे और नेतृत्व वाले प्रदर्शन पर मंगलवार की बातचीत से कोई हल तो नहीं निकला लेकिन बातचीत सही राह में जाती दिखती है। इस प्रदर्शन के संबंध में किसी ने सच ही कहा है कि, “यह प्रदर्शन चेहराविहीन और नेतृत्वविहीन तो है, लेकिन बुद्धिहीन कतई नहीं है।”

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