
16 सितंबर उमर अल-मुख्तार की शहादत की 88वीं वर्षगांठ का प्रतीक है। उन्हें इतालवी आक्रमण का विरोध करने में उनके वीर दृढ़ता के प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता है। लीबिया के कई शहर हर साल 16 सितंबर को सालगिरह मनाते हैं। इसे राष्ट्रीय अवकाश के रूप में घोषित किया जाता है।
साम्राज्यवाद जिस समय भारत मे 23 मार्च 1931 को 3 बहादुर योद्धाओ को फांसी चढ़ा रहा था। उसी साल 16 सितम्बर 1931 को साम्राज्यवादी ताकते लीबिया में लीबिया के 73 साल के महान योद्धा उमर मुख्तयार को फांसी चढ़ा रही थी। ये उन सभी योद्धाओ को साम्राज्यवाद के खिलाफ मानवता के लिए, अपनी जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए लुटेरो के खिलाफ युद्ध लड़ने का इनाम था।
हम को आज 73 साल के उस महान योद्धा के बारे में जानना जरूरी है। जिसने नाजीवाद के खिलाफ 20 साल सशस्त्र संघर्ष किया। एक गुरिल्ला वार किया। बड़ी ही बहादुरी से अपनी जनता के लिए लड़ते हुए शहीद हुआ। साम्राज्यवादी ताकते जिनके पास आधुनिक हथियार, टैंक, तोब, प्रशिक्षित सेनाथी लेकिन फिर भी इतिहास गवाह है कि ये सब होते हुए भी साम्राज्यवाद को पूरे विश्व मे सहस्त्र संघर्ष में आम जनता जो देशी हथियारों से लड़ रही थी, से मुँह की खानी पड़ी है। पूरे विश्व मे साम्राज्यवाद ने छल-कपट से लड़ाइयां जीती है।
उनके अंतिम दिनों में उमर अल-मुख्तार का एक बयान लाखों अरबों और मुसलमानों की जुबां पर था: “हम न आत्मसमर्पण जानते हैं, या तो हम जीतेंगे या हम मरेंगे।”
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