
मुस्लिम पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ‘जन्मस्थान’ न्यायिक व्यक्ति नहीं हो सकता। अयोध्या विवाद की सुनवाई के 24वें दिन सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा, यह याचिका जानबूझ कर लगाई गई जिससे इस पर न तो लॉ ऑफ लिमिटेशन लागू हो और न जबरन कब्जे का सिद्धांत लागू हो। ऐसे में जमीन से हक नहीं छीना जा सकता।
धवन ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष कहा, जन्मस्थान द्वारा दाखिल याचिका का मतलब है कि बाकी पक्षकार मामले से बाहर हो जाएं और रामलला विराजमान को अधिकार मिल जाए।
अमर उजाला पर छपी खबर के अनुसार, अगर राम जन्मभूमि क्षेत्र को देवता बना दिया जाएगा तो पूरा इलाका अपने आप अधिकार संपन्न हो जाएगा। ऐसे में कोई मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी।
इससे पहले सोमवार को सुनवाई शुरू होते ही धवन ने सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति द्वारा सीजेआई रंजन गोगोई को पत्र लिखे जाने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस व्यक्ति ने सीजेआई को 117 पत्र लिखने का दावा किया है, जिसमें उसने रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई को लेकर शीर्ष कोर्ट के न्यायाधिकार पर सवाल उठाए हैं।
वह व्यक्ति इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पत्रकार हैं। इस पर बेंच ने कहा कि उसे अब तक रजिस्ट्री ने ऐसे पत्र की जानकारी नहीं दी है। कोर्ट ने कहा कि आपके द्वारा दाखिल अवमानना याचिका पर हमने 88 वर्ष के व्यक्ति को नोटिस जारी किया। फिर आपने कहा कि कितनी अवमानना याचिका दाखिल करेंगे? आपने ऐसी याचिका दाखिल न करने को कहा था।
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