तालिबान के बहाने भारतीय मुसलमानों का चरित्र चित्रण किया गया। Ravish Kumar

भारतीय हिन्दी चैनलों के लिए तालिबान एक नियमित विषय रहा है। 2014 के पहले जब चैनलों का पतन किसी और रूप में हो रहा था तब दर्जनों शो इस पर बनते थे कि तालिबान भारत के नज़दीक आ गया है। लाहौर पहुँच गया है। तो यहाँ पहुँच गया है। तालिबान के बहाने भारतीय मुसलमानों का चरित्र चित्रण किया गया। आम सियासी बातचीत में आतंकी की जगह तालिबानी शब्द का प्रयोग होता रहा।

अब जब अमरीका तालिबान के साथ समझौता कर चुका है तो उस पर कोई हंगामा नहीं है। क्या अब तालिबान के आतंकी संगठन नहीं माना जाएगा? उसे आतंक के गुनाहों से मुक्त कर दिया जाएगा? भारत ने भी कड़ी निंदा नहीं की है।

19 साल तक तालिबान का ड्रामा चला। इसकी हिंसा की क्रूर तस्वीरें देखीं। कैसी तबाही मचाई तालिबान में। आज इसके नेताओं के साथ बैठकर समझौते हो रहे हैं और वहाँ भारत का भी प्रतिनिधि मौजूद है। तालिबान के नेता चीन और पाकिस्तान का शुक्रिया अदा करते हैं। हैं न कमाल

पाँच साल पहले आज तक का यह प्रोग्राम देखिए। इसमें बताया जा रहा है कि तालिबान के निशाने पर मोदी हैं। आज तक ने तालिबान का वीडियो हाथ लगने का दावा किया है। उस वक्त शपथ ग्रहण से पहले काबुल में भारतीय दूतावास पर हमला हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में आतंकी पकड़े गए हैं उनके लिंक तालिबान से लगते हैं। यही नहीं तालिबान ने मोदी को टार्गेट करने का प्लान बनाया है।

अब पाँच साल में ऐसा क्या हुआ कि तालिबान के आतंकियों से अमरीका समझौता कर रहा है तो उन्हें आतंकी नहीं कहा जा रहा है। उस समझौते के वक्त भारत की भी मौजूदगी होती है। वह भी चुप सा है। प्रधानमंत्री मोदी आतंक के अपने प्रिय
विषय पर चुप हैं।

इस शो के वीडियो को तालिबान के ट्रेनिंग कैंप का बताया गया है। एक किनारे फ़ाइल लिखा है और चैनल का वॉटर मार्क भी है। एक्सक्लूसिव वीडियो। अब ऐसे वीडियो को आप किस तरह से देखेंगे।

यू ट्यूब में जाएँ। 2014 के साल में कई वीडियो तालिबान को लेकर बने हैं।

उनमें से चार पाँच को देखें। फिर अभी जो समझौता हुआ है उस पर जो विश्लेषण छप रहे हैं वो भी पढिए। आपको लगेगा कि विदेश नीति को समझने के लिए टीवी एक अधूरा माध्यम है। आप एक सदमे से गुजरेंगे। तालिबान को लेकर अब तक की बना समझ आपको परेशान करेगी। आप सोचेंगे कि उस समझ का क्या करें और अब जो हुआ है उसे समझ कर क्या करें !

ताकि आप अपनी समझ का विस्तार कर सकें। यह देख सकें कि चैनल जिन जानकारियों के हाथ लगने का दावा करता है उनका कुछ साल बाद क्या हाल होता है। कई बार सही भी साबित होता है। लेकिन इस बार हाल बुरा है।

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