तान्या यादव
दिल्ली दंगों में दर्जनों मासूमों की जान गई, उनकी संपत्ति बर्बाद हो गई, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को अपने ट्विटर अकॉउंट की ज़्यादा चिंता है। अब पीड़ितों को न्याय की उम्मीद केवल न्यायलय से रह जाती है। लेकिन सर्वोच्च न्यायलय के सर्वोच्च न्यायाधीश का कहना है कि वो दंगें नहीं रुकवा सकते हैं। सवाल उठता है कि आखिर जनता किसपर भरोसा रखे? क्या सुप्रीम कोर्ट कथित भड़काऊ भाषण देने वाले नेताओं पर कार्यवाई के आदेश भी नहीं दे सकता?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में दंगा भड़काने के आरोपी भाजपा नेताओं के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। सुनवाई बुधवार को होगी। याचिकाकर्ता हैश मंदर समेत दंगे के पीड़ितों की तरफ से ये केस वकील कॉलिन गोंसाल्वेस केस लड़ रहे हैं। उनकी मांग है कि भड़काऊ भाषण देने वाले कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर और अन्य नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज होनी चाहिए।
CJI एस.ऐ.बोबडे का कहना है कि न्यायालय कभी दंगे नहीं रुकवा पाया है, न्यायालय दंगे नहीं रुकवा सकता। उन्होंने आगे कहा कि “हम ये नहीं कह रहे कि लोगों को मरना चाहिए, हम अमन चाहते हैं लेकिन हमारी भी सीमाएँ है।” उनका कहना है कि कोर्ट केवल दंगे होने के बाद ही कुछ एक्शन ले सकता है।
ये सच है कि न्यायालय ना तो गुजरात दंगे रुकवा पाया है, ना तो मुज़्ज़फरपुर दंगे और ना ही दिल्ली में हुए दंगे। लेकिन न्यायालय का काम न्याय करना भी होता है और किसी के साथ हो रहे अन्याय को रोकना भी। जब दिल्ली दंगों के पहले ही कपिल मिश्रा और उनकी पार्टी के तमाम नेताओं के भड़काऊ भाषण मीडिया में देखे जा रहे थे, तब न्यायालय ने एक्शन क्यों नहीं लिया?
जब जस्टिस मुरलीधर ने दिल्ली पुलिस से भाजपा नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने के फैसले पर 24 घंटे के अंदर जवाब माँगा था तो उनका ट्रांसफर क्यों कर दिया गया? जब दोबारा सुनवाई हुई तो मामले को 4 हफ़्तों के लिए क्यों टाल दिया गया? क्या सुप्रीम कोर्ट भाजपा नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देगा, या फिर ये भी उनकी सीमाओं से बाहर है?
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