विष्णु नागर का व्यंग्यः दिल्ली हिंसा के लिए मोदी-शाह या पुलिस नहीं, या तो नेहरू जिम्मेदार हैं या हम खुद!

नहीं साहब, आप बिल्कुल दुरुस्त हैं। जिम्मेदारी हमारी थी, हमारी है, हमारी रहेगी, क्योंकि जो मारे गए, जो घायल हुए, जिनके घर जलाए गए, जिनकी दुकानें लूटी गईंं, जिनके घरों के दरवाजे तोड़कर दंगाई घुसे, वे भी हमारे थे, आपके नहीं थे! थे क्या? वे हमारे थे, तो स्वाभाविक है, जिम्मेदारी भी हमारी है। आप तो खुद दंगाई थे, दंगा- प्रायोजक थे, आप पुलिस थे, आप ट्रंप के स्वागत-विदाई समारोह में व्यस्त थे, इसलिए जिम्मेदारी हमारी थी। हमारे अलावा कोई जिम्मेदार नहीं। प्रधानमंत्री? नहीं। गृहमंत्री? नहीं। दिल्ली पुलिस? नहीं। दिल्ली सरकार? नहीं। अंततः या तो नेहरू जिम्मेदार हैं या हम हैं!

जिम्मेदारी कभी किसी ताकतवर की नहीं होती, जिम्मेदार हम होते हैं, क्योंकि जो बुरा होता है, हमारे साथ होता है। राजतंत्र का भी यही नियम था, लोकतंत्र का भी यही है और तानाशाही का भी यही है।जो जिम्मेदार नहीं होते, वे सवा लाख लोगों की भीड़ के सामने भारत-अमेरिकी संबंध के गदगद भाव से गीत गाते हैं। अपने मेहमान की ‘भूतो न भविष्यति’ मेहमाननवाजी करने के लिए लाल कालीन बिछवाते हैं। रास्ते में फूलों के गमले लगवाते हैं। यमुना के कीच-कचरे की बदबू से माननीय अतिथि की नाक को सड़ने से बचाने के लिए गंगा से पानी उलीच वाते हैं।

वे ताजमहल की सैर करवाते हैं। राजघाट ले जाने, साबरमती आश्रम में चरखा चलवाने, मीठी-मीठी बातें करने, भव्य भोज करने-करवाने, आदिवासियों- लोक कलाकारों के डांस से ‘अतिथि देवो भव’ का दिल बहलाने में बिजी हो जाते हैं। वे 20 किलोमीटर दूर हो रहे दंगे से भी अपने अतिथि को बचाने की फिक्र तो करते हैं, मगर…. वे मोटेरा स्टेडियम में भीड़ इकट्ठा करने का इतिहास बनाने की फिक्र में दुबले होते हैं। वे अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं, हमें अपनी पूरी करने के लिए छोड़ देते हैं। दंगे हो जाएं तो वे समझ जाते हैं कि लोग अपनी जिम्मेदारी सक्षम ढंग से पूरी कर रहे हैं।

जान हमारी है, जिम्मेदारी भी हमारी है। उनकी अपनी और अपने अतिथि की जान के जिम्मेदार वे हैं। जिम्मेदारी हमारी है, क्योंकि हम देश की इस हालत पर गर्व करना साढ़े पांच साल में भी सीख नहीं पाए हैं। दुर्भाग्य।

अगर दंगाई हमारा लिंग परीक्षण कर रहे थे, आधार कार्ड चैक कर रहे थे, मोबाइल तोड़ रहे थे, पत्रकारों को मार रहे थे, दाल-चावल-सब्जी-आटा लेने गए राहुल को मौत के हवाले कर रहे थे, अंकित शर्मा की हत्या कर उसकी लाश को नाले में फेंक चुके थे, 85 साल की अकबरी को उसके मकान में जलता-मरता छोड़ गए थे, जिस अशफाक की अभी शादी हुई थी,उसकी जान ले चुके थे तो जिम्मेदार हम हैं। हत्यारों का, दंगाइयों का, बलात्कारियों का जुर्म नहीं होता, उन्हें बचाने के लिए आप हैं।

हम जानते हैं कि अंतिम सत्य यही है कि जिसकी मौत हुई है ,वह या उसका परिवार जिम्मेदार है। हेड कांस्टेबल रतनलाल, शाहिद खान, दीपक, मुदस्सिर, मोहम्मद फुरकान इन सब की मौत के लिए हम जिम्मेदार हैंं। जिम्मेदारी इनकी भी थी, मगर ये मारे जा चुके। जो कहे सरकार जिम्मेदार है, वह झूठा है, बेईमान है, देशद्रोही है, पाकिस्तानी है। वह ‘गोली मारो… को’ है। और सर, एफआईआर करने की बिल्कुल जल्दी नहीं। अपने दंगाइयों को आराम से बचा लीजिए। नेता इन्हीं में से पैदा होते हैं।

हम तो पहले से जानते थे कि जिम्मेदार हम हैं। अब तो नेहरू भी कहने लगे हैं कि अरे भाई मैं 56 साल पहले मर चुका हूं, मुझ पर कितनी जिम्मेदारी और डालोगे! मरा हुआ गांधी हो या मैं, इतनी जिम्मेदारी नहीं संभाल सकता। मेरा सीना न तब छप्पन इंच का था, न अब है। मैंने तो जीते जी कुछ किया नहीं, सब तो मोदीजी ने किया है तो अब मरकर मैं क्या कर सकता हूं!

मोदीजी-शाहजी आप बिलकुल भी परेशान न हों। जो मारे गए , वे हमारे थे, जिन्होंने मारा, वे हमारे बीच के थे, जिम्मेदार हम हैं। हमें जिम्मेदार बनना सीखना पड़ेगा, मोदीजी के कंधों पर से जिम्मेदारी कम करके उन पर देश-विदेश मौज मारने का बोझ डालना होगा। मोदीजी, पब्लिक डिमांड पर इतना बोझ आप उठा लें, प्लीज। वैसे इसके लिए भी हम क्षमाप्रार्थी हैं। मालूम है कि आप फकीर हैं और झोला उठाकर चल देने को उतावले हैं। चल देने से पहले कपड़ों से लोगों को पहचानने की कला का अगला पाठ ‘जागे हुए हिंदुओं’ को पढ़ाकर उन्हें कृतार्थ कर जाएं प्लीज!

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