नई दिल्ली: आयोध्या में मंदिर मस्जिद के मालिकाना हक को लम्बे समय तक विवाद चलता रहा जिसके बाद फैसला राम मंदिर के हक में आया लेकिन इस फैसले से मुस्लिम पक्षकार सन्तुष्ट नही हैं,लेकिन अगर कोई मुसलमान ही मस्जिद में ताला लगाया जाए तो फिर क्या कहें ?
कानपुर में एक ऐसी मस्जिद है, जिसका मालिकाना हक भी मुस्लिमों के पास है लेकिन इस पर ताला भी मुसलमानों ने डाल दिया है। 10 साल पहले 2009 में रमजान के जुमा अलविदा को इसमें नमाज शुरू होनी थी, लेकिन मस्जिद पर नियंत्रण और इमाम बरेलवी या देवबंदी विचारधारा को लेकर बात फंस गई। मामला जिला प्रशासन तक पहुंच गया। तब से आज तक इस मस्जिद का ताला न खुलने के पीछे मूल जड़ बरेलवी-देवबंदी विवाद है।

क्या है विवाद ?
इस मस्जिद का निर्माण सऊदी अरब में रहने वाले इकराम उल्ला (मूल निवासी तलाक महल) ने अपनी वसीयत में कराने को कहा था। उनके तीन पुत्रों में एक फजल ने तलाक महल में पड़ी अपनी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनवाने को लेकर कोशिशें कीं। यहां पर विधायक इरफान सोलंकी के चाचा इकबाल सोलंकी ने मस्जिद निर्माण में मदद की।
बाद में यह तय हुआ कि फजल देवबंदी विचारधारा के हैं, उनकी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनी है तो कमेटी और इमाम उनकी विचारधारा का होगा। जबकि, इकबाल सोलंकी और अन्य लोग यहां पर बरेलवी मसलक का इमाम रखना चाहते थे।
इस मामले से जुड़े रहे ऑल इंडिया सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी मोहम्मद सलीस ने बताया कि बाद में मामला निपटाने की कोशिश हुई। यह तय हुआ कि कमेटी देवबंदी और इमाम बरेलवी विचारधारा का होगा।
न यहां पर देवबंदी विचारधारा से प्रभावित गैर जनपद या विदेशी जमात रुकेगी और न ही बरेलवी विचारधारा से संबंधित नमाज के बाद सलाम होगा। फार्मूला दिया गया था कि बरेलवी इमाम के पीछे देवबंदी नमाज पढ़ लेते हैं तो कोई परेशानी नहीं होगी। इस मामले से जुडे़ तलाक महल के मोहम्मद सलीम बताते हैं कि मस्जिद का ताला बंद है लेकिन एकाध दीवार में छेद होने से मवेशी भी चले जाते हैं।
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