नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में मुसलमान सिर्फ एक वोटर बनकर रह गया है,बड़ी संख्या में होने के बावजूद राजनीति में भाग्यदारी मात्र उंगलियों पर गिनने लायक है,चुनाव के समय अधिकतर पार्टियाँ मुस्लिम वोट पर नज़र रखती हैं लेकिन परिणाम आने के बाद नजरअंदाज करती हैं।
भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि भारत के 15 राज्यों- असम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड में कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं है।
तथा इसके अलावा इन दस अन्य राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश और दिल्ली में एक-एक मुस्लिम मंत्री है।
महाराष्ट्र चुनाव के बाद बनी शिवसेना सरकार में चार मुस्लिम विधायकों को अपने मंत्रिपरिषद में शामिल किया, जिसके बाद महाराष्ट्र पश्चिम बंगाल के बाद सबसे बड़ा मुस्लिम मंत्रियों वाला राज्य बना गया है, बंगाल में सात मुस्लिम मंत्री हैं।

एनसीपी के हसन मुश्रीफ और नवाब मलिक, कांग्रेस के असलम शेख महाराष्ट्र में कैबिनेट मंत्री नामित किए गए, जबकि शिवसेना के अब्दुल सत्तार को विस्तार के बाद राज्य मंत्री बनाया गया.
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार में सात मुस्लिम मंत्री हैं. जिसमें फ़रहाद हकीम, जावेद अहमद खान, अब्दुर रज़्ज़ाक मोल्ला, गियासुद्दीन मोल्ला, जाकिर हुसैन, गुलाम रब्बानी और सिद्दीकुल्लाह चौधरी शामिल हैं.
केरल में पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार में केटी जलील और एसी मोइदीन मुस्लिम मंत्री हैं।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के एक दशक बाद, जिसने सभी क्षेत्रों में कम मुस्लिम प्रतिनिधित्व को उजागर किया था. राज्य सरकारों में भी इस समुदाय का प्रतिनिधित्व कम हैं. 11 राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री में से उत्तर प्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां पर मंत्रिपरिषद में मुस्लिम मंत्री हैं।
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