ब्रिटेन की सदन में दिल्ली हिंसा पर ख़ूब चर्चा हो रही है, लेकिन भारत की संसद इसपर ख़ामोश है, क्यों?

भारत की संसद में भले ही दिल्ली हिंसा पर चर्चा करने के लिए विपक्षियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा रही है। हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले सांसदों को निलंबित किया जा रहा है। लेकिन ब्रिटेन की सदन में नज़ारा इसके उलट है। वहां के हाउस ऑफ कॉमन्स में सांसद बेबाकी से दिल्ली हिंसा पर अपनी राय रख रहे हैं।

ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में मंगलवार को विपक्षी लेबर पार्टी, कन्जर्वेटिव पार्टी, लिबरल डेमोक्रेट्स और भारतीय मूल के कई सांसदों ने एक सुर में दिल्ली हिंसा और नागरिकता कानून को लेकर भारत सरकार की जमकर आलोचना की और ब्रिटेन सरकार से इसपर कड़ी कार्रवाई करने की अपील की।

हाउस ऑफ कॉमन्स में लेबर पार्टी की सांसद नादिया व्हिटोम ने दिल्ली हिंसा को हिंदुओं द्वारा मुसलमानों का क़त्लेआम करार देते हुए भारत की मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि इसे दंगा या दो समुदायों के बीच टकराव नहीं कहा जाना चाहिए। ये मुस्लिम और कई अल्पसंख्यक समुदायों पर जारी हिंदुत्ववादी हिंसा का एक सिलसिला है, जो भारत में मोदी की बीजेपी सरकार ने मंज़ूरी दी है।

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वहीं ब्रिटिश सिख लेबर पार्टी के सांसद तनमनजीत सिंह ढेसी ने दिल्ली हिंसा को 1984 के सिख विरोधी दंगों जैसा बताया। उन्होंने सदन में कहा कि दिल्ली की हिंसा ने 1984 के सिख विरोधी दंगों की दुखद यादों को ताज़ा कर दिया है, जब वह भारत में पढ़ रहे थे और उनकी साथी सांसद प्रीत कौर गिल ने भी 1984 दंगों का संदर्भ दिया।

इसके साथ ही लिबरल डेमोक्रेट सांसद एलिस्टेयर कारमाइकल ने कहा कि सीएए और दिल्ली हिंसा अगल करके नहीं देखना चाहिए। भारत में ऐसे हालात असम में एनआरसी लाने और कश्मीर में मोदी सरकार की कार्रवाई के बाद बने हैं। ये भारत में मुसलमानों को हाशिए पर रखने के लिए डिज़ाइन किया गया मालूम पड़ता है।

ऐसा नहीं है कि दिल्ली हिंसा पर चर्चा सिर्फ ब्रिटेन की सदन तक ही सीमित है। दुनिया भर के कई देशों ने इस हिंसा को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। ईरान के साथ अब तक कुल चार मुस्लिम बहुल देश भी दिल्ली हिंसा पर चिंता जता चुके हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता मामलों संबंधी अमेरिकी आयोग (यूएससीआईआरएफ) के साथ वहां के कई राष्ट्रपति उम्मीदवार और सांसद दिल्ली हिंसा पर अपनी संवेदनाए व्यक्त कर चुके हैं।

ईरान तो दिल्ली हिंसा पर टिप्पणी करते हुए भारत सरकार से मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा को रोके जाने की मांग तक कर चुका है। भारत ने ईरान को जवाब देते हुए इसे आंतरिक मामला बताया है। भारत सरकार का ईरान को दिया जवाब बिल्कुल सही है, बेशक ये भारत का आंतरिक मामला है। हैरानी की बात ये है कि भारत के इस आंतरिक मामले की चर्चा ब्रिटेन की सदन में तो हो रही है, लेकिन भारत की संसद इसपर ख़ामोश है।

By: Asif Raza

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