
देश की सबसे बड़ी सरकार के पीएम मोदीजी ने न्यू इंडिया बनाने की एक व्यापक परियोजना के तहत नयी दिल्ली के 4 किलोमीटर में फैले सेंट्रल विस्टा तथा हजारों सरकारी कर्मचारियों के लिये इसी क्षेत्र में एक स्टेट ऑफ द आर्ट सुविधासंपन्न हरित सचिवालय बनाने और वर्तमान संसद भवन को नया रूप, नयी छवि और संभव विस्तार दे कर फिर से नयी दिल्ली के निर्माण के काम का अनुबंध जारी करवा दिया है।
मोदीजी एक के बाद एक ऐसा निर्णय लेते हैं जिससे दिल्ली शहर न केवल आदर्श बने अपितु अनुकरणीय भी बन सके। इसी सोच से मोदीजी ने दिल्ली की 1797 कच्ची कॉलोनियों के 40 लाख से अधिक निवासियों के दुख-दर्द और चिंताओं को दूर करने के लिये एक साहसपूर्ण निर्णय लिया है। उन्होंने राजनीति के नफे नुकसान के सिद्धांत को दरकिनार करते हुये 1797 अनियमित कॉलोनियों को एक साथ पास किये जाने और वहां के निवासियों को मालिकाना हक देने की व्यावहारिक विस्तृत अनूठी योजना तैयार करवाई है।
इससे मल्टिपलिसिटी ऑफ अथारटीज के कारण होने वाली बेवजह देरी की आशंका समाप्त हो जायेगी। संसद में अगले महीने के मध्य में विधेयक पारित होने के साथ ही डीडीए कॉलोनियों का सीमांकन, कालोनियों में रह रहे परिवारों के दस्तावेज की जांच, ले आऊट बनाने, प्ल़ाट के रकबे के आधार पर रजिस्ट्री की मामूली राशि लेने के बाद फटाफट उन्हें मालिकाना हक देने लगेगी। आकलन के अनुसार सौ वर्ग गज के भूखंड के मकान के लिये महज 3500 रु और दो सौ वर्ग गज के आवास के लिये केवल 7 हजार रु देने होंगे।
तेजी से कच्ची कॉलोनियां नियमित होने लगेंगी। पहली बार ऐसी योजना बनायी गयी है जिसमें कोई अवरोध नहीं है, योजना बुलेट ट्रेन जैसी है जो मंजिल पर पहुंचने पर रुकेगी। इससे कई दशकों से बिना किसी सुविधा के नारकीय जीवन बिता रहे निवासियों के जीवन का अंदाज, सुविधायें, जीवन शैली, सामाजिक और पर्यावास में अपेक्षा से अधिक बदलाव आयेगा। दिल्ली में असमान विकास की विसंगतियां दूर की जायेंगी और पास कॉलोनी में वह तमाम सुविधायें होंगी जो उन्नत नियमित कॉलोनियों में हैं। योजना का मकसद गरीबों की विकास से वंचित कॉलोनियों का फटाफट कायाकल्प करना है जिससे दिल्ली का कैनवास सुधरा, निखरा, चमका नजर आयेगा।
40 लाख लोगों के घर के सपने साकार होंगे और उनके घर के ऊपर से तोड़फोड़ की लटकती तलवार इतिहास बन जायेगी। मोदीजी की योजना पक्का भरोसा है न कि दिल्ली की 21वीं शताब्दी की सरकारों जैसा धोखा, छलावा, बहकावा। सभी मानते हैं कि 1797 कच्ची कॉलोनियों के कायाकल्प के बिना समूची दिल्ली को सुंदर, विकसित नहीं बनाया जा सकता।
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