CAB: इतिहासकार, फिल्मकार, लेखक, पूर्व न्यायाधीश 600 महान हस्तियों ने लिखा खुला खत!

CAB: इतिहासकार, फिल्मकार, लेखक, पूर्व न्यायाधीश 600 महान हस्तियों ने लिखा खुला खत!

लोकसभा द्वारा पारित किए गए नागरिकता संशोधन बिल को लेकर विरोध थमता नज़र नहीं आ रहा है। उत्तर पूर्वी राज्यों में जहां इस कानून को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं इसी बीच देश की 600 मशहूर हस्तियों ने भी सरकार से इस कानून को वापस लेने की मांग कर दी है।

इंडिया टीवी न्यूज़ डॉट कॉम पर छपी खबर के अनुसार, विरोध करने वाली हस्तियों में इतिहासकार, फिल्मकार, लेखक, पूर्व न्यायाधीश शामिल हैं। इन हस्तियों ने एक खुले पत्र में इस बिल को धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ बताया है। इन हस्तियों का आरोप है कि यह कानून संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है।

नागरिकता संशोधन विधेयक में जिन हस्तियों ने आवाज उठाई है उसमें इतिहासकार रोमिला थापर, फिल्मकार आनंद पटवर्धन, नंदिता दास और अपर्णा सेन, लेखक अमिताव घोष, सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव, तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मांदर, अरुणा रॉय और बेजवाडा विलसन, दिल्ली हाईकार्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह और देश के पहले मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला शामि हैं।

पत्र में इन हस्तियों ने लिखा है कि यह विधेयक विभाजनकारी, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है। यह एक राष्ट्रव्यापी एनआरसी के साथ मिलकर देश भर के लोगों के लिए अनकही पीड़ा लेकर आएगा। यह भारतीय गणतंत्र की प्रकृति को, मौलिक रूप से और अपूरणीय रूप से क्षति पहुंचाएगा। यही कारण है कि हम मांग करते हैं कि सरकार विधेयक को वापस ले।

“यही कारण है कि हम मांग करते हैं कि सरकार संविधान के साथ विश्वासघात न करे। हम अंतरात्मा की आवाज पर सभी लोगों से आग्रह करते हैं कि समान और धर्मनिरपेक्ष नागरिकता के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धता का सम्मान किया जाए।”

पत्र में कहा गया है अगर बिल में धार्मिक उत्पीड़न का तर्क दिया गया है, तो म्यांमार के रोहिंग्या या श्रीलंका के हिंदू या मुस्लिम तमिलों या पाकिस्तान के अहमदियों जैसे शरणार्थियों को क्यों छोड़ा गया।

केवल तीन देशों पर ध्यान केंद्रित करें जैसे कि ये शरण चाहने वालों के एकमात्र संभावित स्रोतों का गठन करते हैं?” उन्होंने पूछा, अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप शरणार्थी नीति की आवश्यकता पर जोर देते हुए, न कि एक विचारधारा द्वारा निर्धारित कानून जो राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का उपयोग करता है।

पत्र में पूछा गया है कि “नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 भारत की समावेशी, समग्र दृष्टि को हिलाकर रख देता है जिसने हमारे स्वतंत्रता संघर्ष को निर्देशित किया। 1955 के नागरिकता अधिनियम में पेश किए गए संशोधनों में, नया संविधान के इन मूल सिद्धांतों में से हर एक का उल्लंघन करता है।

Syndicated Feed from hindi.siasat.com Original Link- Source

اپنی رائے یہاں لکھیں