
हाल के दिनों में विभिन्न राज्यों में नियुक्त राज्यपालों को देखकर लगता है कि भाजपा ने अपने उस अहम रणनीति को बदल दिया है जिसके अंतर्गत अन्य दलों से पार्टी में आने वाले लोगों को बड़े पद नहीं दिए जाएंगे। ये पद केवल खांटी भाजपाई और संघ परिवार से आने वाले शख्स के लिए आरक्षित होते थे।
न्यूज़ ट्रैक पर छपी खबर के अनुसार, मोदी सरकार में पिछले पांच वर्षों के दौरान नियुक्त हुए लगभग सभी राज्यपाल या तो खांटी भाजपा काडर से थे या पूर्व नौकरशाह।पिछले वर्ष जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए सत्यपाल मलिक एकमात्र अपवाद रहे।
वे 1989 में अलीगढ़ से जनता दल के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। लेकिन 1996 में सपा के टिकट पर लड़कर वे चौथे स्थान पर रहे थे। शनिवार को घोषित हुए राज्यपाल के नामों में जहां जगदीप धनकड़ जनता दल से कांग्रेस के रास्ते भाजपा तक पहुंचे हैं वहीं फागू चौहान कुछ साल पहले तक बसपा में थे।
जहां धनकड़ भी 1989 में राजस्थान के झुंझनू से जनता दल के टिकट पर सांसद बने और वीपी सिंह की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे, वहीं फागू चौहान 2007 में उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार में मंत्री पद पर थे।
पार्टी ने दूसरे दलों से आकर भाजपा में शामिल होने वालों को कभी बड़े पद नहीं दिए। पिछली बार हरियाणा कांग्रेस छोड़कर भाजपा के टिकट पर जीते चौधरी बीरेंद्र सिंह ही मोदी मंत्रिमंडल में कैबिनेट स्तर के मंत्री बनाए जाने वाले एकमात्र दलबदलू नेता थे।
उनके अलावा कांग्रेस से आए राव इंद्रजीत सिंह और राजद छोड़कर भाजपा के टिकट पर जीते राम कृपाल यादव को राज्यमंत्री का दर्जा देकर मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान मोदी सरकार द्वारा नियुक्त लगभग सभी राज्यपाल संघ और भाजपा की पृष्ठभूमि से थे।
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