क्या बीजेपी हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे के लिए NRC का इस्तेमाल कर रही है?

क्या बीजेपी हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे के लिए NRC का इस्तेमाल कर रही है?

संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने असम के विवादित नागरिकता रजिस्टर का बचाव किया है और कहा है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर से बाहर 20 लाख लोग स्टेटलेस नहीं होंगे.
भारत में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने नागरिकता रजिस्टर को विदेशी घुसपैठियों का पता लगाने के लिए जरूरी बताया है.

असम में भी भारतीय जनता पार्टी की ही सरकार है. आलोचकों का कहना है कि बीजेपी हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे के लिए इसका इस्तेमाल कर रही है और प्रांत के अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकार छीनना चाहती है जिनमें से बहुत से बांग्लादेश की आजादी के समय पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आए थे.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त फिलिपो ग्रांदी ने नई दिल्ली से लोगों की नागरिकता छीनने से बचने की अपील करते हुए कहा, “यह नागरिकताहीनता को समाप्त करने की कोशिशों के वैश्विक प्रयासों के लिए गहरा धक्का होगा.”

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने नागरिकता रजिस्टर बनाने की प्रक्रिया को उचित ठहराते हुए कहा कि एनआरसी लोगों को नागरिकताविहीन नहीं बनाता. उन्होंने कहा कि जो भी फैसले लिए जाएगें वे भारतीय कानून और लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप होंगे.

भारतीय दूतावास द्वारा जर्मन में जारी बयान के अनुसार विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, “एनआरसी शब्द के कानूनी दायरे में छूटे लोगों को विदेशी नहीं बनाता.” बयान में कहा गया है, “जो अंतिम सूची में नहीं हैं, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा और कानून के तहत उपलब्ध उपायों के खत्म होने तक सभी अधिकारों का उपयोग करते रह सकेंगे.”

पूर्वोत्तर में बसा 3.3 करोड़ की आबादी वाला भारतीय राज्य असम बांग्लादेश की सीमा पर है और ब्रिटिश राज के जमाने से ही आप्रवासियों का आकर्षण रहा है.

राष्ट्रीयता नागरिकता रजिस्टर में सिर्फ उन्हें शामिल किया गया है जो साबित कर सकें कि उनके पूर्वज 1971 से पहले असम में रहते थे. जिन लोगों को सूची में शामिल नहीं किया गया है उनके पास तथाकथिक विदेशी ट्रब्यूनल के सामने अपील करने के लिए 120 दिनों का समय है.

वे अपनी अपील के लिए अदालतों का सहारा भी ले सकते हैं. एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार मामलों की जांच के लिए 500 ट्रिब्यूनल बनाए जाएंगे और जिन लोगों के पास कानूनी लड़ाई के लिए धन नहीं होगा उन्हें सरकार कानूनी मदद देगी.

आलोचकों का कहना है कि एनआरसी की प्रक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी पार्टी की हिंदूवादी एजेंडे के अनुरूप है और इससे बाहर रखे गए ज्यादातर लोग मुसलमान हैं. लेकिन इस बीच बीजेपी के स्थानीय नेता भी आरोप लगा रहे हैं कि बहुत से बांग्लाभाषी हिंदुओं को भी सूची से बाहर रखा गया है जो पार्टी का वोट बैंक है.

अधिकारियों का कहना है कि सूची बनाते समय कोई धार्मिक भेदभाव नहीं किया गया है. इस बीच स्थानीय मीडिया में ऐसी खबरें भी आ रही हैं बहुत से आदिवासी समुदायों ने एनआरसी में रजिस्टर कराने के लिए आवेदन नहीं दिया है क्योंकि वे अपने को भूमिपुत्र मानते हैं और आवेदन देने की जरूरत नहीं समझते.

ये साफ नहीं है कि उन लोगों का क्या होगा जो सूची में शामिल होने के लिए उपलब्ध कानूनी उपायों के इस्तेमाल के बावजूद नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे. सैद्धांतिक रूप से उन्हें बांग्लादेश वापस भेजे जाने के लिए छह में से एक डिटेंशन सेंटर में कैद किया जा सकता है.

लेकिन बांग्लादेश में पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया है. बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज्ज्मा खान ने एनआरसी को भारत का घरेलू मामला बताया और कहा, “1971 के बाद से कोई बांग्लादेशी भारत नहीं गया है.”

साभार- डी डब्ल्यू हिन्दी

Syndicated Feed from hindi.siasat.com Original Link- Source

اپنی رائے یہاں لکھیں

Discover more from ورق تازہ

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading