27 May, 2022 19:49

*महाराष्ट्र में प्राथमिक शिक्षा है बदहाल: एमपीजे*
अकोला:[सैय्यद असरार हुसैन ]:निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के बावजूद महाराष्ट्र में प्राथमिक शिक्षा को लेकर कई समस्याएं हैं. महाराष्ट्र में प्राथमिक शिक्षा का बुरा हाल है. आज हम एक गंभीर लर्निंग क्राइसिस (सीखने के संकट) का सामना कर रहे हैं. विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों और आकलनों से प्रदेश की सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में हमारे प्राथमिक स्कूल के छात्रों के सीखने के परिणामों की खेदजनक स्थिति सामने आई है. प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा की बदहाली का खुलासा आज यहाँ देश की अग्रणी जन आंदोलन मुव्हमेंट फ़ॉर पीस एंड जस्टिस फ़ॉर वेलफेयर (एमपीजे) ने किया. एमपीजे के प्रवक्ता ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि, विश्व बैंक ने प्राइमरी स्कूल जाने वाले आधे से ज़्यादा बच्चों को शिक्षण के आधार पर ग़रीब क़रार दिया है. भारत सरकार द्वारा आयोजित नेशनल अचीवमेंट सर्वे में महाराष्ट्र के आधे से ज़्यादा छात्रों का प्रदर्शन ख़राब रहा.
गौर तलब है कि, बच्चे एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जा रहे हैं, लेकिन विडंबना यह है कि उनमें से कुछ ही अपेक्षित कक्षा-स्तरीय दक्षताओं में महारत हासिल कर पाते हैं. शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (ASER) के अनुसार कक्षा 3 के 72% और कक्षा 5 के 51% छात्र कक्षा 2 का पाठ पढ़ने में असमर्थ पाए गए. कक्षा 1 में 84% बच्चे निर्धारित स्तर पर पाठ नहीं पढ़ पाते हैं, जबकि लगभग 40% बच्चे अक्षरों को पहचान भी नहीं पाते हैं. इनमें से 59 फीसदी बच्चे दो अंकों की संख्या को नहीं पहचान पाए. आठवीं कक्षा पास छात्र चौथी कक्षा के गणित के प्रश्न हल नहीं कर पाए.
आप को बता दें कि, राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण 2017 में, प्रदेश के कक्षा 8 के छात्र गणित और विज्ञान में केवल 40% और सामाजिक विज्ञान में 42% प्रश्नों का उत्तर दे सके. कक्षा 8 के 37 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी गणित और विज्ञान में 33 प्रतिशत अंक प्राप्त नहीं कर सके.
एमपीजे प्रवक्ता ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि, महाराष्ट्र में लगभग 80% छात्र सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में नामांकित हैं. सरकारी स्कूलों पर भारी निर्भरता वाले राज्य के लिए यह स्थिति वाक़ई चिंताजनक है.
उन्होंने बताया कि, कोविड-19 के दौरान तक़रीबन दो साल स्कूल बंद होने से बच्चों को शिक्षा में भारी नुकसान हुआ है. कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि, स्कूल बंद होने से अधिकांश बच्चे स्कूली शिक्षा से पूरी तरह से कट गए थे. हालांकि महामारी की अवधि के दौरान, स्कूलों ने बच्चों को ऑनलाइन शिक्षित करने का कार्यक्रम चलाया, जो पूरी तरह विफल साबित हुआ. न तो सभी शिक्षक ऑनलाइन कक्षाओं के संचालन में कुशल थे और न ही अधिकांश छात्र उपकरणों और डेटा का प्रबंधन करने में सक्षम, क्योंकि आर्थिक गतिविधियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था. पुअर लर्निंग आउट कम की वजह से कक्षा 9-10 में उच्च ड्रॉपआउट होता रहा है और महामारी के चलते हुए नुक़सान ने ड्रॉपआउट की दर और बढ़ने की संभावना है.
आप को बता दें कि, एमपीजे ने आज यहाँ शिक्षण समस्याओं को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना देकर ख़राब शिक्षा व्यवस्था पर विरोध प्रदर्शन करते हुए सरकार से अविलम्ब विभिन्न कारणों से विद्यालय से बाहर हो चुके विद्यार्थियों को वापस लाने के लिए आवश्यक कार्यवाही करने, शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने, शिक्षा के अधिकार को अक्षरशः लागू करने तथा कोविड प्रेरित शिक्षा के नुक़सान की क्षतिपूर्ति के लिए उपचारात्मक कक्षाएं प्रारंभ करने की मांग की.
मोहम्मद अतीक उर रहेमान जि.अधयक्ष एम पी जे अकोला

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