तमाम राजनीतिक पार्टियों से दूरी और ओवैसी से नजदीकी बढ़ा रहे हैं देश के मुसलमान,सामने आई रिपोर्ट

नई दिल्ली: ऑल इण्डिया मजलिस ऐ इत्तिहादुल मुस्लिमीन जिसका नेतृत्व साँसद असदउद्दीन ओवैसी करते हैं देशभर में बड़ी तेजी के साथ मक़बूलियत बना रही है,इससे देशभर में एक बड़े बदलाव के संकेत दिखाई देने लगे हैं।

क्योंकि पारंपरिक रूप से मुसलमान खासकर अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले उम्मीदवारों को वोट नहीं देते थे. इसके बजाय उनकी प्राथमिकता कांग्रेस तथा अन्य क्षेत्रीय दल होते थे जिनका सामाजिक आधार व्यापक होता था. यह रणनीति एक विशेष उद्देश्य से संचालित होती थी यानी भारतीय जनता पार्टी को सत्ता कब्जाने से रोकना. बीजेपी ने बहुसंख्यक समुदाय के मुस्लिम पार्टी के पुराने डर (देश के बंटवारे में मुस्लिम लीग की भूमिका) का फायदा उठाकर हिंदू वोटों को ध्रुवीकरण किया।

लेकिन महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मुसलमानों ने अच्छी खासी संख्या में एआईएमआईएम को वोट दिया. इसने पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में हासिल किए गए आधार का विस्तार करने और 21 अक्टूबर को महाराष्ट्र चुनावों के साथ-साथ विधानसभा उप-चुनावों में हिंदी भाषी क्षेत्र में प्रवेश करने में सक्षम बनाया. यह मुसलमानों द्वारा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसे अन्य क्षेत्रीय संगठनों, जो अपने चुनावी लाभ के लिए समुदाय के समर्थन पर निर्भर हैं, को छोड़ने की शुरुआत हो सकती है।

मुसलमानों की चुनावी प्राथमिकताओं में यह बदलाव महाराष्ट्र में बहुत साफ जाहिर है. एआईएमआईएम ने कुल 44 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से दो सीटों, धुले सिटी और मालेगांव सेंट्रल में पार्टी को जीत मिली और चार सीटों में वह दूसरे स्थान पर रही. पार्टी को राज्य के 288 निर्वाचन क्षेत्रों में डाले गए कुल मतों का 1.34 प्रतिशत प्राप्त हुए. 2014 में, एआईएमआईएम ने 24 निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवार खड़े किए थे और दो सीटों, औरंगाबाद सेंट्रल और बायकुला में जीत हासिल की थी, तीन क्षेत्रों में पार्टी दूसरे स्थान पर रही और कुल वोटों का 0.93 प्रतिशत मतदान उसे प्राप्त हुआ था।

2019 में Aimim के प्रदर्शन का विश्लेषण कांग्रेस-एनसीपी और बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की पृष्ठभूमि में किया जाना चाहिए. इन चारों दलों ने 2014 के चुनावों में स्वतंत्र रूप से भागेदारी की थी. इसके मायने यह हुए कि इस साल के विधानसभा चुनावों में, एआईएमआईएम को मुसलमानों को कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को वोट देने से रोकना था और साथ ही चुनाव जीतने के लिए इससे ज्यादा वोट लेने थे।

इस मायने में एआईएमआईएम का प्रदर्शन हैरतअंगेज करने वाला था. इसने चार निर्वाचन क्षेत्रों में 30000 से 40000, तीन में 40000 से 50000 के बीच, दो में 50000 से ऊपर और एक में एक लाख से ऊपर वोट हासिल किए. धुले शहर में, एआईएमआईएम ने 2014 में हासिल किए 3775 वोटों से 2019 में 46679 की बढ़त हासिल की, मालेगांव सेंट्रल में उसे 2014 में 21050 वोट मिले थे, वहीं 2019 में वोटों की संख्या बढ़कर 117242 हो गई. हालांकि पार्टी औरंगाबाद सेंट्रल में इस विशाल बढ़त को बरकरार नहीं रख सकी, लेकिन 2014 की तुलना में उसे 6482 वोट अधिक मिले. इसी तरह भले ही शिवसेना एआईएमआईएम से भायखला सीट कब्जाने में कामयाब रही लेकिन एआईएमआईएम को यहां 2014 की तुलना में 5843 वोट अधिक मिले.

ऐसा लगता है कि दोनों गठबंधनों ने भायखला में एआईएमआईएम की संभावनाओं को बहुत कम करके आंका. इंडियन यूथ कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव नदीम नुसरत ने मुझसे बात करते हुए कहा, “हमारा कहना है कि एआईएमआईएम बीजेपी विरोधी वोटों को बांटती है.” उन्होंने कहा कि “एआईएमआईएम यह कह सकती है कि कांग्रेस भायखला से अपने प्रत्याशी को बैठी दे तो उसका मौजूदा विधायक जीत सकता है.” शिवसेना ने 51180 वोट हासिल कर भायखला में जीत दर्ज की. एआईएमआईएम को 31157 और कांग्रेस को 24139 वोट मिले।

2014 के चुनावों से तुलना करें तो कांग्रेस-राकांपा गठबंधन ने कई निर्वाचन क्षेत्रों में एआईएमआईएम के वोटों में सेंध लगाई है. उदाहरण के लिए, नांदेड़ दक्षिण में, एआईएमआईएम का रुझान 2014 में 34590 से घटकर 2019 में 20512 वोट हो गया. परभणी में पार्टी ने 2019 में 22741 वोट हासिल किए थे जो 2014 के 45458 वोटों की तुलाना में भारी गिरावट है. मुंबादेवी में पार्टी ने 2014 में 16165 की तुलना में इस साल 6373 वोट पाए. फिर भी नांदेड़ दक्षिण और परभणी के नतीजों से समझा जा सकता है कि एआईएमआईएम ने समर्थकों का एक कोर बना लिया है जो बीजेपी के विकल्प के रूप में मानी जाने वाली पार्टियों को वोट नहीं देता।

एआईएमआईएम के चुनावी प्रदर्शन की कई अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएं थीं. पार्टी ने बालापुर में शानदार शुरुआत की, जहां उसके उम्मीदवार ने 44507 वोट हासिल किए, जो एनसीपी को मिले वोटो से दोगुना है. एआईएमआईएम के 44 उम्मीदवारों में से 12 गैर-मुस्लिम थे. हालांकि इसे अक्सर मुस्लिम पार्टी के रूप में पहचाना जाता है, इसके अध्यक्ष, असदुद्दीन ओवैसी ने अक्सर मुसलमानों, दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच एक सामाजिक गठबंधन बनाने पर जोर दिया है. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र औरंगाबाद पश्चिम में एआईएमआईएम के उम्मीदवार, अरुण विट्ठलराव बोर्डे 39366 वोट प्राप्त कर तीसरे स्थान पर रहे. कुर्ला आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में रत्नाकर डी दावरे को 17000 से अधिक वोट मिले।

इन नतीजों से कांग्रेस और क्षेत्रीय संगठनों को एआईएमआईएम के बारे में परेशान होना चाहिए. एआईएमआईएम के साथ मुस्लिम एकीकरण बढ़ने से दलितों और ओबीसी के बीच असंतुष्ट समूह भी ओवैसी के साथ जाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं. पार्टी ने किशनगंज विधानसभा क्षेत्र के लिए हुए उपचुनाव में बिहार में अपनी पहली सीट जीती. इस जीत ने हिंदी पट्टी में एआईएमआईएम की शुरुआत का संकेत दिया है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने पहले ही एआईएमआईएम की जीत को दलित-मुस्लिम एकता के लिए अनुकूल बताना शुरू कर दिया है।

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ विधानसभा उपचुनाव में एआईएमआईएम का प्रदर्शन किशनगंज में उसकी जीत से भी अधिक महत्वपूर्ण था. पार्टी को मई में हुए लोकसभा चुनावों में किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में लगभग दो लाख वोट पड़े थे और किशनगंज विधानसभा सीट जीतने का उसके पास अच्छा मौका था. हालांकि प्रतापगढ़ में एआईएमआईएम पहली बार चुनाव लड़ रही थी फिर भी उसके उम्मीदवार इसरार अहमद को 20269 वोट मिले. एआईएमआईएम ने समाजवादी पार्टी से लगभग 3000 वोट कम हासिल किए. बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल चुनाव जीत गई लेकिन दूसरा स्थान एआईएमआईएम को हासिल हुआ जबकि कांग्रेस और बसपा भी मैदान में थीं।

अक्सर ओवैसी धर्मनिरपेक्ष खेमे पर आरोप लगाते हैं कि वोट के लिए ये पार्टियां मुसलमानों के अंदर बीजेपी के डर को भुनाती हैं और फिर अगले चुनाव उनको भूला देती हैं. कई मौकों पर ओवैसी ने कहा है कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियां मुसलमानों को ज्यादा भाव नहीं देती क्योंकि उन्हें पता है कि मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं देंगे. आम लहजे में कहें तो ओवैसी की आलोचना का अर्थ यह है कि धर्मनिरपेक्ष दलों को मुस्लिम वोटों के बारे में अपनी बनी-बनाई धारणा को छोड़ना चाहिए..”

ओवैसी की रैलियों में हमेशा ही भारी भीड़ उमड़ती है. खास तौर से मुस्लिम युवाओं की. लेकिन इन वोटरों ने एआईएमआईएम को इसलिए वोट नहीं दिया कि वह बीजेपी को हरा सकती है. हाल के विधानसभा चुनावों के परिणामों से पता चलता है कि ओवैसी की प्रसिद्धि अब एआईएमआईएम के लिए वोटों में बदल रही है. मोटे तौर पर ऐसा इसलिए है क्योंकि राजनीतिक दलों ने उनके इस आरोप को सही साबित कर दिया है कि वे मुसलमानों से वोट तो लेते हैं लेकिन चुनाव के बाद उन्हें भूल जाते हैं. देश भर में एनआरसी लागू करने की केंद्र सरकार की धमकियों और लिंचिंग के खिलाफ जनमत तैयार करने में धर्मनिरपेक्ष दलों की अनिच्छा पर मुस्लिम स्तब्ध हैं. वे युवा कांग्रेस नेताओं द्वारा अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने का समर्थन करते सुनकर चौंक गए।

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