फ़ैक्ट चेक: 300 साल पहले दफ़नाया गया ‘योगी’ ध्यान की अवस्था में ज़िन्दा मिला?

सोशल मीडिया में एक वीडियो धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है. इसमें एक व्यक्ति के शरीर पर कई घाव दिखाई दे रहे हैं. और उसके घावों से खून भी बह रहा है. वीडियो को इस दावे से शेयर किया जा रहा है कि वो एक ‘सिद्धार (योगी) हैं, जिन्हें 300 साल पहले तमिलनाडु के वल्लीयूर में दफ़नाया गया था. साथ ही ये भी दावा है कि वल्लीपुर के मंदिर के रिनोवेशन के दौरान ये ज़िंदा मिले हैं. वायरल मेसेज में दावा किया गया है कि वो तीन सदियों से ‘योगासन’ में हैं. ऑल्ट न्यूज़ के ऐप पर इस वीडियो की पड़ताल के लिए कई रिक्वेस्ट मिली हैं.

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ये वायरल मेसेज कई और भाषाओं में शेयर किया गया है. हिन्दी में शेयर किया गया मेसेज इस प्रकार है -“यह है सिद्धार्थ योगी जिन्होंने 300 साल पहले तमिलनाडु के वल्लियुर में समाधि ली थी वल्लियुर मंदिर के लिए मिट्टी खोदते समय उन्हें जीवित पाया गया सिद्धार्थ योगासन में बैठे नजर आए थे ऐसा है भारत जिसकी दुनिया कल्पना भी नहीं कर सकती”

गुजराती में भी वीडियो के साथ ये मेसेज लिखा हुआ है -“તામિલનાડુ ના વલ્લિયાર માં 300 વર્ષ પહેલાં એક સિધ્હાર યોગીએ સમાધી લીધેલ હતી અને તે જમીન પર તેનું મંદિર બનાવેલ હતુ અને આજે 300 વર્ષ પછી તે મંદિર ને રિનોવેસન કરવા માટે ખોદકામ કરાવ્યું તો તેની માટી માંથી તે યોગી નુ જીવિત શરીર મલ્યું તો દર્શન કરો તેવા મહાપુરુષ નાં”

कन्नड़ भाषा में शेयर किए गए मेसेज के अनुसार – “5 ವರುಷದಿಂದ ಸಮಾದಿಯಲ್ಲಿ ಇದ್ದವರು ಎದ್ದು ಬಂದಿದ್ದಾರೆ ಮಾತಾಡುತ್ತ ಇದ್ದಾರೆ ತುಂಬಾ ತುಂಬಾ ಆಶ್ಚಾರ್ಯ ಪುರಾಣದಲ್ಲಿ ಕೇಳಿದ್ದುವಿ ನೋಡಿರಲಿಲ್ಲ” – मेसेज का दावा है कि ये व्यक्ति फ़िर से जीवित हुए हैं.

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फ़ैक्ट-चेक

इस वीडियो को पहले भी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संगठन जैसे ‘डेली मेल’ ने शेयर किया था. वीडियो के साथ दावा किया गया है कि इस व्यक्ति की ये हालत एक महीने तक भालू की गुफ़ा में ममी की अवस्था में रहने की वजह से हुई थी. उस वक़्त इस वीडियो की पड़ताल AFP ने की थी. ज़्यादातर मीडिया संगठनों ने रशियन मीडिया संगठन ‘The Siberian Times’ को इसका सोर्स बताया है. ये वीडियो पहले भी ‘EurAsia Daily’ पर पाया गया था लेकिन मीडिया संगठनों द्वारा प्रसारित किए जाने से पहले ये वीडियो यूट्यूब पर ‘भालू की गुफ़ा’ के दावे से चल रहा था.

वास्तव में इस व्यक्ति का नाम अलेक्ज़ेन्डर है. ‘AFP’ के मुताबिक, “इस व्यक्ति की पहचान एक ऐसे ग्रुप ने की थी जो कज़ाकिस्तान के अक्टोबे में गुम हुए लोगों को ढूंढने का काम करते हैं और उन्हें ज़ेलो पोइस्क (Zello Poisk) कहा जाता है.”

ऊपर दिए गए स्क्रीनशॉट में नीले रंग से अन्डरलाइन किए गए मेसेज में बताया गया है -“We have found that the man in this video is from our city. He is being treated in one of our city’s [Kazakhstan] hospitals and his health is improving. (अनुवाद – हमने पाया कि वीडियो में दिख रहे व्यक्ति हमारे ही शहर के है. उनकी देखभाल इसी शहर (कज़ाकिस्तान) में की जा रही है और अब उनकी सेहत में सुधार हो रहा है.)”

अक्टोबे मेडिकल सेंटर के निर्देशक रुस्तम इस्वायव ने ‘AFP’ से इस बात की पुष्टि की कि वो उस व्यक्ति का इलाज कर रहे थे और उन पर भालू ने हमला नहीं किया था. उनका नाम अलेक्ज़ेन्डर है. वो एक स्किन रोग सोरायसिस से पीड़ित हैं.

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इस ख़बर को पहले भी यूके के टैब्लॉइड ‘द सन’ ने शेयर किया था. उनकी ख़बर के मुताबिक, 41 वर्षीय अलेक्ज़ेन्डर की मौत “काफ़ी महीनों तक बीमारी के लक्षणों को नज़रअंदाज़ करने की वजह से हुई थी. इस वजह से वो क्रोनिक सोरायसिस से गंभीर रूप से बीमार हो गए थे.” रिपोर्ट में बताया गया है, “अब कज़ाकिस्तान के कज़ाक़ शहर के पूर्व ऑइल कर्मचारी की मौत एक बड़े घाव में सेप्सिस हो जाने से हो गई थी.” अलेक्ज़ेन्डर की मौत 25 जुलाई, 2019 को हुई थी.

इस तरह सोशल मीडिया का दावा कि वे एक ‘योगी’ हैं और उन्हें 300 साल पहले ज़मीन में दफ़नाए जाने के बाद ध्यान की अवस्था में ज़िंदा पाया गया है, गलत और काफ़ी विचित्र है.

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