मृणाल पाण्डे का लेखः विद्या ददाति विनयम्, भागवत जी !

अहमदाबाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की बैठक में संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने अचानक यह कह कर सबको चौंका दिया कि देश में तलाक लगातार बढ़ रहे हैं, जिसकी बड़ी वजह परिवारों में बढ़ती आमदनी और शिक्षा दर है। विद्या और धन पाने से मन में अहंकार का उदय होता है, जिसकी वजह से वैवाहिक तालमेल टूटता है और परिवार बर्बाद हो जाते हैं।

उनका यह भी कहना था कि संघ के सभी स्वयंसेवकों को संघ की गतिविधियों और सोच से अपने परिवारों को भी परिचित कराना चाहिए, क्योंकि 2000 साल पहले जब महिलाएं खुद को घर तक सीमित रखती थीं, वह हम हिंदुओं का स्वर्ण युग था। मातृशक्ति से ही हम को हिंदुत्व पर गर्व के संस्कार मिले हैं। इसलिए उनका दाय अधिक कठिन और बड़ा बनता है।

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इससे पहले (जनवरी, 2013) में भी भागवत ने कहा था कि महिलाओं का मूल उत्तरदायित्व घर- गृहस्थी चलाना है। अगर वे इससे विलग हो जाएं, तो उनका परित्याग किया जा सकता है। भागवत संघ के बड़े सम्मानित, बुजुर्ग नेता हैं और उनके कहे का असर दूर तक जाता है। उनकी इस स्थापना (जो संघ ने जारी की) से संभव है संघ परिवार से जुड़े कई एक लोगों को भी लगने लगे कि भारतीय परिवार संस्था पर भारी खतरा मंडरा रहा है।

यदि इसकी जड़ें शिक्षा में बढ़ोतरी से है, तब तो बेटी पढ़ाओ नारे को दोबारा देखना पड़ेगा। शिक्षा, खासकर स्त्री शिक्षा और परिवारों की औसत आमदनी की दर में बढ़ोतरी को सीधे जोड़ना तर्क के विपरीत है। परंपरा की बात करें तो भी अपने यहां कहा गया है कि विद्या मुक्त करती है (साविद्या या विमुक्तये), विद्या विनयशीलता देती है (विद्या ददाति विनयम्)। दूर क्या जाना? खुद बीजेपी सरकार की मेक इन इंडिया, बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ सरीखी नीतियां भी क्या यही रेखांकित नहीं कर रहीं कि आय बढ़ना और शिक्षा स्तर बढ़ना राष्ट्र के लिए कितना जरूरी है?

दरअसल कई बार लोग, विशेषकर गैर शादीशुदा लोग, जिन्होंने परिवार या पत्नी का झंझट ही नहीं पाला, जब परिवारों पर बोलना शुरू करते हैं तो उनके तर्क निजी अनुभव या राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों की बजाय सुनी-सुनाई स्थापनाओं पर आधारित होते हैं। अगर हम जनगणना के ताजा (2018 के) आंकड़ों, तलाक पर हुए अकादमिक शोध, और तलाक से जुड़ी सलाह देने वालों की स्थापनाएं देखें तो उपरोक्त धारणा एक सिरे से निरस्त हो जाती है कि विद्या और आय में वृद्धि अहंकार को जन्म देती है, जिससे परिवार टूटते हैं।

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सचाई यह है कि दुनिया के सबसे कम तलाक भारत में होते हैं। हमारे यहां तलाक दर सिर्फ 0.25 प्रतिशत की है जबकि अमेरिका में यह 50 प्रतिशत है | उधर यह भी गौरतलब है कि खुद भारतीय पुलिस के आंकड़ों के अनुसार हमारे परिवारों में महिलाओं पर शारीरिक हिंसा की दर लगातार बढ़ी है। दंड विधान की महिला हिंसा निरोधी धारा 498ए के अंतर्गत आज भी हर साल औसतन 50 हजार मामले दर्ज किए जा रहे हैं। इनमें से दो प्रतिशत से कम मामलों में उत्पीड़कों को सजा होती है।

विशेषज्ञों की राय में कानून तथा पुलिस की शिथिलता देखते हुए पारिवारिक उत्पीड़न के अधिकतर मामले दर्ज ही नहीं होते, लिहाजा मारपीट की शिकार विवाहित महिलाओं की असली तादाद तो दर्ज मामलों से भी कहीं ऊंची हो सकती है। सहज सवाल है कि महिलाएं अगर अधिक पढ़ लिख कर इज्जत से रहने लायक कमा रही हैं, तो वे अपने ऊपर हो रहे पारिवारिक उत्पीड़न को सहने की बजाय और अधिक तादाद में तलाक लेकर उससे मुक्ति पा लेतीं? हमारी तलाक दर इतनी कम क्यों है?

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री सूरज जेकब और नृवंश शास्त्री श्रीपर्णा चट्टोपाध्याय के द्वारा इस बाबत किए शोध के परिणाम इस पर रोशनी डालते हैं कि सरकारी जनगणना के आंकड़ों के तहत जनगणना के दौरान तलाकशुदा जोड़ों में से खुद को तलाकशुदा या अलग होने वालों की श्रेणी में दर्ज कराने वालों में महिलाओं की तादाद अधिक है। वजह यह, कि अधिकतर पुरुष हमारे समाज में तलाकशुदा होने का लांछन स्त्रियों की तरह नहीं झेलते और अक्सर दोबारा शादी कर सकते हैं, जो स्त्रियों के लिए संभव नहीं।

तलाकशुदा कहते ही दूसरों की तो दूर खुद रिश्तेदारों की नजरों में भी स्त्री की हैसियत घट जाती है। इसीलिए लड़कियों के परिवार उनको एडजस्ट करने की सलाह देते पाए गए हैं। अपने परिवार वालों से भी समर्थन न मिलना भी स्थिति असहनीय न हो जाए तब तक पत्नी द्वारा तलाक का आत्यंतिक कदम नहीं उठाने की बड़ी वजह है।

दूसरी अचर्चित सचाई यह है कि जनगणना आंकड़ों में दर्ज तलाक के मामलों में ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में खास भिन्नता नहीं है। यह रोचक है कि तलाक की दर देश के मिजोरम, नगालैंड, छत्तीसगढ़ तथा केरल सरीखे उन प्रांतों में औसत से अधिक पाई गई, जो विगत में मातृसत्तात्मक थे या जहां अनुसूचित जनजातियों की बहुलता है। इन राज्यों के पारंपरिक वैवाहिक कानून, विवाह विच्छेद के मामले में लचीला रुख रखते आए हैं। देश के राज्यों के बीच भी तलाक के आंकड़ों में बहुत फर्क है।

उदाहरण के लिए मिजोरम में तलाक की दर देश में सबसे अधिक (4.08 प्रतिशत) पाई गई, जबकि उत्तर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश या हरियाणा जैसे राज्यों में जहां महिलाओं की साक्षरता दर और आय औसत से कम है, और लगभग 75 प्रतिशत शादियां तयशुदा होती हैं, बहुत कम तलाक होते हैं। फिर भी महिलाओं के खिलाफ शारीरिक हिंसा और उनकी कमजोर शारीरिक स्थिति के मामलों में ये राज्य औसत से आगे हैं। हम नहीं जानते कि क्या संघ प्रमुख भारत की सभी महिलाओं के लिए उनकी बिहार या यूपी की बहनों जैसी प्रतिगामी यथास्थिति को बनाए रखने की पेशकश कर रहे थे, लेकिन यह तय है कि खुद महिलाएं, खासकर पढ़ी-लिखी महिलाएं ऐसा निश्चित ही नहीं चाहेंगी।

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इसमें दो राय नहीं, कि देश में बड़े परिवार सामाजिक या आर्थिक कारणों से टूटते जा रहे हैं और ग्रामीण क्षेत्र से बूढ़ों को पीछे छोड़कर नई तरह के काम की खोज में युवा जोड़ों का शहरी जीवन बिताने के लिए पलायन पारिवारिक ढांचे में बदलाव की एक बड़ी वजह बनता जा रहा है। स्त्री शिक्षा को देश की हर सरकार ने लगातार बहुत प्रोत्साहन दिया है। इससे मातृ-शिशु मृत्यु दर, आबादी की दर कम हुई और महिलाओं की आयुष्य दर बढ़ी है।

पर इसने 70 सालों बाद अब राज-समाज के सामने नई चुनौतियां भी विमोचित की हैं। मुफ्त शिक्षा के प्रताप से अब गांवों में दसवीं या बारहवीं पास लड़कियां घर-घर में हैं। उनके अपने सपने और अरमान हैं, जो उनको लगता है शहर में ही पूरे होंगे, जहां परिवारों का पारंपरिक शिकंजा नहीं होगा और वे भी जिन नए-नए रोजगारों के विज्ञापन सरकार उनको दिखाती रहती है, उनमें पति की तरह काम पा जाएंगी और दो-दो आमदनियों से घर तथा बच्चों का भविष्य संवार सकेंगी।

यह छोटी सी चाह किसी सिरे से नाजायज नहीं है। अगर वे संघ प्रमुख की सलाह के विपरीत खुद को घर की चारदीवारी के भीतर बंद नहीं रखना चाहतीं, और हिंसा या मानसिक उत्पीड़न के खिलाफ तनकर मनुष्य की गरिमा सहित उसे चुनौती देती हों तो लोकतंत्र में यह भी नितांत सहज-स्वाभाविक चाह क्यों न मानी जाए? महिला को महज घरेलू कामगार और बच्चे (लड़के) पैदा करने की मशीन सरीखा मानकर उसे हर हाल में पति की इच्छानुसार काम करने की आज्ञा देना 2020 के भारत में धारा के विपरीत जाना है। क्योंकि इस बात पर भी शोध शास्त्री और नेता एकमत हैं कि कामगारों की फौज में महिलाओं की तादाद बढ़ने का सकल आय दर के बढ़ने से और माता की शैक्षिक योग्यता से उसके बच्चों के बेहतर मानसिक स्तर के बीच एक गहरा रिश्ता बन गया है।

प्रमाण खोजने दूर नहीं जाना होगा। दिल्ली विधानसभा चुनावों में मतों का विश्लेषण बता रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की महिलाओं को घर से निकलकर मुफ्त यात्रा करने की सुविधा देकर और बेहतर स्कूलों और स्वास्थ्य कल्याण का प्रबंध करके उनके रिकार्ड तोड़ मत हासिल किए; तब हम को गहरा संशय है कि खुद संघ के नेता भागवत की मध्यकालीन विचारधारा से सहमत होकर स्त्री शिक्षा या परिवारों की आय बढ़ाने की योजनाओं को पलीता लगा देंगे।

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आज टू व्हीलर या पक्का मकान धन-दौलत के प्रतीक नहीं, इस बात के प्रतीक हैं कि नए विचार, शहरी विचार गांवों में पहुंच चुके हैं। इसीलिए हर राज्य में होने वाला चुनाव अपने आप में एक क्रांति है। क्योंकि वह शहरी, विस्थापित होकर गांव से शहर आए लोगों और गांव के किसानी समाज को सीधे दिल्ली के तख्तेताऊस से जोड़ता है। उसका वोट ही राजा बनाता और गिराता है, यह हर वोटर जान चुका है, इसमें समझना क्या है?

भागवत जी की तरह कइयों को शिकायत है कि ईमानदारी और सहिष्णुता का, प्राचीन पारिवारिक अदब कायदे निबाहने का, औरत को हर जगह दोयम दर्जे का जीव मानकर उसका भविष्य दूसरे को देने की प्रथा का स्तर घट रहा है। हां कम हो रहा है। लेकिन इसका क्या इलाज है? जब घर-घर जाकर बीजेपी नेता हर औरत, मर्द का वोट मांगते थे, औरत प्रत्याशी के खिलाफ औरत प्रत्याशी उतार रहे थे, तो क्या वे समझते थे कि राज की बागडोर उनके ही हाथ में रहेगी?

राजनीति सड़क पर आई तो सड़क छाप होगी ही। जिस सड़क छाप भगिनी ब्रिगेड की मदद से उनको केंद्र में सत्ता मिली उसे सत्ता के यंत्रों से वे कितनी देर तक परे रख सकेंगे? सही बात यह है कि दीनदयाल जी और श्यामा प्रसाद जी वाला हिंदुस्तान अब समाप्त हो रहा है। वह नेतृत्व ब्रिटिश परंपराओं में पला था और जर्मनी से आयातित विचारों से प्रभावित था।

अब 70 बरस के समुद्र मंथन से भारत का सही अर्थों में भारतीय रूप निकल रहा है। वह जिद्दी उद्दंड जैसी हो आज की पीढ़ी के मन में पढ़ने, नेट पर दुनिया देखने, बाहर नौकरी करने और अपनी मर्जी से शादी-ब्याह करने को लेकर पुरानी पीढ़ी की तरह कोई पछतावा या दुविधा नहीं है। भागवत जी अचरज से कहते हैं कि पहले की तुलना में आज हर भारतीय असंतुष्ट और क्रोध से भरा है। जी है! सुकरात ने कहा था कि मैं एक संतुष्ट सुअर की बजाय असंतुष्ट सुकरात बनना पसंद करूंगा। भारत आज एक असंतुष्ट मतदाताओं का देश है। इस असंतोष से किसी को गिला क्यों हो?

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