आकार पटेल का लेख: भारत में न तो ट्रम्प की रुचि है और न ही कोई ज्ञान, सिवाए मनोरंजन के और कुछ नहीं है यह दौरा 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प कल भारत पहुंचेंगे। वे अहमदाबाद, आगरा और दिल्ली में कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे और कुल दो दिन भारत में रहेंग। वैसे वह भारत आने को कोई खास उत्सुक नहीं थे, और अमेरिकियों के लिए यह कोई खास बात भी नहीं है। मैं जब 16 साल का था तो मैंने अमेरिका के एक गांव में करीब एक साल गुज़ारा। वहां एक स्कूल में ऐसी व्यवस्था थी कि एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत अमेरिकी छात्रों को एख साल के लिए दूसरे देश में जाने का मौका मिलता था। और जहां तक मुझे याद है कोई भी अमेरिकी भारत आने को तैयार नहीं था।

राष्ट्रपति बनने के बाद से डोनाल्ड ट्रम्प यूरोप के 20 देशों का दौरा कर चुके हैं। वह चार बार फ्रांस जा चुके हैं। वह विकासशील दुनिया को नापसंद करते हैं और गंदगी से भरे देशों के अप्रवासियों को पसंद नहीं करते हैं। इन देशों की सूची में वह भारत को भी रखते हैं। वैसे तो वह अफगानिस्तान भी जा चुके हैं, लेकिन वहां वे सिर्फ एक अमेरिकी सैन्य अड्डे ही पहुंचे। भारत पहला ऐसा गरीब देश होगा जिसे ट्रम्प राष्ट्रपति के तौर पर शायद पहली बार देखेंदे। यह देखना दिलचस्प होगा कि वे भारत से कितना प्रभावित होते हैं, खासतौर से सलिए भी क्योंकि वे अपनी टिप्पणियों में कुछ भी बोल सकते हैं।

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डोनल्ड ट्र्म्प औपचारिक रूप से भारत का दौरा करने वाले छठे राष्ट्रपति हैं। ड्वाइट डी आइजनहावर पहले अमेरिकी राष्ट्र थे, जो भारत आए थे। वे विश्व युद्ध के एक प्रसिद्ध जनरल थे जो राष्ट्रपति बने और उन्होंने ही "सैन्य औद्योगिक परिसर” यानी मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स जैसा मुहावरा गढ़ा था। बीबीसी के मुताबिक "भारत की राजकीय यात्रा पर आने वाले लगभग हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने यात्रा कार्यक्रम का एक ही तरह का रहा है, वे महात्मा गांधी के स्मारक पर फूल चढ़ाते हैं, ताजमहल के दीदार करते हैं, संसद को संबोधित करते हैं और दिल्ली के प्रतिष्ठित रामलीला मैदान में जनसभा करते हैं। एक रिपोर्ट को सही माने तो रामलीला मैदान में 10 लाख लोग आ सकते हैं।

इसी तरह का स्वागत 20 साल पहले भारत आने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी हुआ था। मुझे क्लिंटन का दौरा अच्छी तरह याद है, खासतौर से संसद के अंदर जो कुछ हुआ था वह। एक सांसद, शायद वह रामदास अठावले थे, वह तो अपनी मेज पर झुक से गए थे क्लिंटन से मिलने के लिए।

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उस समय क्लिंटन ने भारत के लिए कुछ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था, खासतौर से हमारे न्यूक्लियर प्रोग्राम और पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्तों को लेकर। लेकिन फिर भी देश में एक हिंदुत्ववादी सरकार (वाजपेयी सरकार) और क्लिंटन के उदारवादी होने के बावजूद क्लिंटन की यह भारत यात्रा ठीकठाक रही थी। यहां के बाद कुछ देर के लिए क्लिंटन पाकिस्तान भी गए थे। उस समय ऐसा ही रिवाज था ताकि पाकिस्तान को बुरा न लगे।

लेकिन वैचारिक स्तर पर इसका लटा ही हुआ, जब जॉर्ज बुश अमेरिकी राष्ट्रपति थे। वे कंजर्वेटिव पार्टी के राष्ट्रपति थे और उन्होंने भारत में उदारवादी सरकार (मनमोहन सिंह सरकार) के दौर में भारत की यात्रा की थी। वह भी गर्मजोशी भरी यात्रा थी लेकिन क्योंकि बुश के पास क्लिंटन जैसा करिश्मा नहीं था, फिर भी विश्लेषकों ने इस यात्रा को बहुत शानदार माना था क्योंकि इस दौरे में भारत-अमेरिका परमाणु समझौता हुआ था।

बराक ओबामा दो बार भारत आए। एक बार जब मनमोहन पीएम थे और उसके बाद जब मोदी पीएम थे। ओबामा की यात्रा के दौरान मोदी अपना नाम लिखा सूट पहना था, जिसकी खूब चर्चा हुई थी। दूसरी तरफ ओबामा एक मध्यवर्गीय व्यक्ति थे जो मरम्मत किया हुआ जूता पहनते थे। मुझे आज भी इस बात पर आश्चर्य है कि मोदी और भारतीयों के बारे में उन्होंने क्या सोचा होगा जब मोदी ने अपना नाम लिखा महंगा सूट पहना था।

ओबामा एक बुद्धिजीवी हैं और मनमोहन को अपना गुरु कहते हैं। ट्रम्प और मोदी इस मायने में समान हैं। दोनों लोकप्रिय हैं और रैलियां करने में उन्हें मजा आता है। दोनों सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, अहंकारी हैं (मोदी खुद को तीसरे व्यक्ति में अक्सर संदर्भित करते हैं, जबकि ट्रम्प को ईमानदारी से एक उचित अहंकारी के रूप में वर्णित किया जा सकता है)। दोनों आक्रामक रूप से आप्रवासी विरोधी हैं। ट्रम्प ने कुछ देशों से अमेरिका आने वाले मुसलमानों पर प्रतिबंध लगाया था और मोदी ने अपने नागरिकता संशोधन कानून से इन्हें बाहर रखा है।

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क्लिंटन और बुश की यात्रा के विपरीत, ट्रम्प के आने का कोई विशेष कारण नहीं है। वह यहां गणतंत्र दिवस के लिए भी नहीं हैं, जो कि एक क्लासिक इन्वीटेशन माना जाता है। वह अहमदाबाद में मोदी के साथ एक रैली में बोलेंगे, ताज का दौरा करेंगे और फिर चले जाएंगेष कोई व्यापार सौदा नहीं हो रहा है जिस पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। ट्रंप चाहते हैं कि भारत अमेरिकी किसानों के लिए अपना बाजार खोले, जो मोदी के लिए करना मुश्किल होगा। और मोदी ने भारत को आयात शुल्क के साथ उत्तरोत्तर अधिक संरक्षणवादी बना दिया है, जो अमेरिकी वस्तुओं को व्यापार सौदे के माध्यम से और अधिक जटिल बनाता है।

भारत चाहेगा कि उसे कपड़ों के निर्यात जैसी चीजों के लिए अमेरिकी बाजारों तक तरजीह मिले, लेकिन ऐसा होने वाला नहीं है। दरअसल हाल के हफ्तों में अमेरिका ने भारत को उन देशों की सूची से हटा दिया है जिन्हें विशेष छूट मिलती हैं। विश्व शक्ति दिखने की हमारी महत्वाकांक्षा तो है, लेकिन हम अभी हैं नहीं, इसके कुछ निश्चित परिणाम भी होते हैं।

बैंगलौर स्थित भारतीय कंपनियां आसान वीजा नियम चाहती हैं, लेकिन यह भी संभव नहीं हो रहा है क्योंकि ट्रम्प की आव्रजन की नीतियां मूलत: एशियाई लोगों के खिलाफ ही हैं।

तो फिर ट्रम्प की यात्रा से हासिल क्या होगा?

यह कुछ लोगों के लिए महज एक मनोरंजन होगा, और निश्चित रूप से उन लोगों केलिए नहीं जिन्हें ट्रम्प की यात्रा के लिए बेघर कर दिया गया है। इतिहास में ट्रम्प की यह यात्रा महत्वहीन यात्रा के तौर पर दर्ज होगी। वैसे भी ट्रम्प की न तो भारत में कोऊ रूचि है और न ही वे यहां के बारे में कुछ जानते हैं।

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और आखिरी बात यह है कि अगले साल ट्रम्प इन महीनों में अनेरिका के राष्ट्रपति होंगे या नहीं, किसी को नहीं मालूम। अमेरिकी चुनाव नवंबर में हैं, और यह संभव है कि इस बार व्हाइट हाउस में डेमोक्रेट आ जाएं। अगर ऐसा होता है, तो न केवल हमें ट्रम्प-मोदी केमिस्ट्री पर खर्च सारे निजी हितों और निवेश को भूलना होगा, बल्कि नए सिरे से भारत अमेरिका रिश्तों की इबारत लिखाना होगा।

व्हाइट हाउस में एक डेमोक्रेट राष्ट्रपति होने का अर्थ कश्मीर पर अमेरिका की गहरी नजर, नागरिकता संशोधन कानून-सीएए और एनआरसी-एनपीआर विवाद पर गहरी अमेरिकी समीक्षा। इस यात्रा से अगर कुछ निकलता है तो सिर्फ यह कि मोदी अमेरिका में बसे भारतीयों को ट्र्म्प को वोट देने के लिए प्रोत्साहित कर सकें।

(यह लेखक के अपने विचार हैं और नवजीवन का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है)

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