अच्छी फिल्मों के लिए खुला है दुनिया का बाजार, बस कहानी में दम हो और दुनिया उसे माने, ना कि सिर्फ फिल्मकार

हाल में असमिया भाषा की एक फिल्म चर्चा में थी। फिल्म का नाम था ‘आमिस’। यह फिल्म अमेरिका के एक बड़े फिल्म फेस्टिवल (ट्राइबेका फिल्म फेस्टिवल) में पिछले साल नवंबर में रिलीज हुई थी। फिर यह हिंदुस्तान आई। आलोचकों ने फिल्म की तारीफ के पुल बांधे। हालांकि, कई ऐसी फिल्में होती हैं जो फिल्म आलोचकों और दर्शकों को एक साथ पसंद आती हैं, लेकिन इस फिल्म की खासियत यह थी कि इसे एक अजूबे विषय वाली फिल्म बताया गया। फिल्मकार अनुराग कश्यप ने ट्वीट करके लोगों को बताया कि इस तरह की फिल्म हिंदुस्तानी दर्शकों ने आज तक देखी नहीं है।

खैर, इस फिल्म की कहानी क्या है? कहानी कुछ ऐसी है कि एक युवक, एक शादीशुदा लेकिन पति से नौकरी की वजह से अलग रह रही डॉक्टर के संपर्क में आता है। दोनों में दोस्ती होती है। युवक के दिमाग में महिला को प्रभावित करने का खेल चल रहा है। हालांकि औरत के दिमाग में ऐसा कुछ नहीं है। दोनों की रुचियां, खासकर खानपान को लेकर, एक सी हैं। दोनों मांसाहार के प्रेमी हैं।

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युवक, औरत को प्रभावित करने के लिए लगभग हर उपलब्ध मांस को खुद पका कर लजीज तरीके से पेश करता है, कई बार अपने हाथों से बनाकर भी। औरत बड़े चाव से खाती है। दोनों में लगाव बढ़ता है। एक समय ऐसा आता है, जब युवक ने सभी किस्म के मांस उस औरत को खिला दिए हैं। अब नया खिलाने को कुछ नहीं है। तो, एक दिन वह युवक उस औरत को अपने ही शरीर का मांस काटकर और पकाकर खिलाता है। इसके आगे भी कहानी है, लेकिन यहां बताना जरूरी नहीं।

तो, कहानी का चौंकाने वाला कथ्य यह है कि प्रेम पाने के लिए युवक अपने शरीर का मांस पकाकर उस औरत को खिलाता है, जिससे वह इकतरफा प्रेम करता है। संदेह नहीं, कि इस तरह के कथानक वाली कोई फिल्म पहले कभी यहां, हिंदुस्तानी सिनेमा में दिखी नहीं। ‘आमिस’ फिल्म के लेखक-निर्देशक भास्कर हजारिका हैं। उनके हिसाब से यह उनकी मौलिक कहानी है।

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लेकिन पिछले पुस्तक मेले से मैं एक किताब खरीद लाया। नाम है ‘सिंध की लोक कथाएं!’ इसमें एक कहानी है, ‘सुहिणी मेहार’! यह दरअसल सुहिणी (युवती) और मेहार (युवक) की प्रेम कहानी है। मेहार रोज नीयत समय पर अपनी प्रेमिका सुहिणी से मिलता था। वह रोज रात सुहिणी के लिए पकी हुई मछलियां लाता। दोनों प्रेम से खाते और प्रेम करते। एक दिन जोर का तूफान आया। मछुआरे मछलियां फांस न सके। वह अपनी प्रेमिका के पास खाली हाथ कैसे जाता। सो, उस दिन उसने अपनी जांघ चीरकर गोश्त निकाला, उसे पकाया और सुहिणी के पास ले आया!

यहां, इस सिंधी लोक कथा का हवाला इसलिए नहीं दिया ताकि हम भास्कर हजारिका की ‘आमिस’ की कथा के मौलिक होने पर संदेह जारी कर सकें। बल्कि इसका मकसद सिर्फ यह बताना है कि लोक कथाओं में मौलिक कहानियों की कमी का रोना रोने वाले हिंदी सिनेमा के लिए कितना मसाला छुपा हुआ है। खैर, अगर बात बॉलीवुड की करें तो कहना न होगा कि हाल के वर्षों में कुछ लेखकों, अभिनेताओं और फिल्मकारों ने ऐसे विषयों को छूने और उन पर फिल्में बनाने की कोशिश की है जो अभी तक अछूत माने जाते थे। इस पर ज्यादा अंदर जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन जो गौर करने वाली बात है, वो यह कि इसी दौरान गैर हिंदी सिनेमा, हिंदी सिनेमा के मुकाबले कई गुना अधिक प्रयोगधर्मी हुआ है।

हम यहां नहीं कह रहे कि इस दौर से पहले हिंदी या गैर हिंदी सिनेमा ने विषय और शैली को लेकर प्रयोग नहीं किए हैं। बल्कि यह कहना चाह रहे हैं कि हाल में कथ्य और शैली को लेकर जिस तरह का काम देखने को मिल रहा है, वह पहले नहीं दिखा। मेरे हिसाब से इसके दो तीन बड़े कारण हैं। पहला बड़ा कारण तकनीक का सस्ता होना है। फिल्में बनाना पहले के मुकाबले काफी सस्ता हुआ है। कैमरा और एडिटिंग से जुड़े मशीन और तकनीक सस्ते हुए हैं। अब आप छोटे कैमरे और अपने लैपटॉप का इस्तेमाल करके भी फिल्म बना सकते हैं। लोग बना भी रहे हैं।

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दूसरी बात, अंतरराष्ट्रीय सिनेमा तक आम लोगों की पहुंच है। फिल्म समारोहों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध दुनिया भर की फिल्मों की सहज उपलब्धता ने नवोदित फिल्मकारों को बताया है कि दुनिया में किस-किस तरह की फिल्में बन रही हैं। तीसरी और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अच्छी फिल्मों के लिए पूरा विश्व एक बड़ा बाजार बन गया है। हां, यहां शर्त यह है कि फिल्म अच्छी हो और दुनिया उसे अच्छी फिल्म माने, न कि फिल्मकार खुद उसे अच्छी फिल्म मानता रहे… जैसा कि अक्सर होता है। खासकर हिंदुस्तान में जहां हर दूसरा फिल्मकार अपने को महानता के बिलकुल करीब पाता है।

अब आप देखिए, एक अच्छी फिल्म बनाकर इस बार दक्षिण कोरिया के फिल्मकार बोंग जून हो ने क्या कमाल किया। ऑस्कर अवार्ड के इतिहास में पहली बार हुआ है कि किसी विदेशी भाषा की फिल्म को बेस्ट फिल्म का अवार्ड मिला है। ‘पैरासाइट’ नाम की इस फिल्म में समाज में मौजूद वर्ग संघर्ष और आर्थिक असमानता के जरिए मानवीय मूल्यों और रिश्तों की कहानी मनोरंजक तरीके से कही गई है। सबसे पहले इस फिल्म ने प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वोच्च पुरस्कार बटोरे। फिर उसके बाद अब दुनिया के सबसे बड़े फिल्म पुरस्कार समारोह में सबसे बड़ा सम्मान ले लिया।

यह जानिए कि ऑस्कर अवार्ड या कान फिल्म फेस्टिवल सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं होते कि वे बहुत बड़े फेस्टिवल और अवार्ड होते हैं। बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण होते हैं कि यहां अवार्ड पाने वाली फिल्मों के लिए एक बड़ा बाजार खुल जाता है। इन फिल्मों का बिजनेस कई गुना बढ़ जाता है। यह भी गौर करिए कि अगर कहानी में दम हो, कहानी ऐसी हो जिसकी यूनिवर्सल अपील हो, तो फिर आज का दौर यह है कि आप किसी अच्छी फिल्म को दबा नहीं सकते। जैसा कि हमारे यहां प्रतिभाओं को दबाने का रिवाज है। लेकिन फिल्मों के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता।

आमतौर पर हम देखते हैं कि हिंदुस्तानी फिल्मकार अपनी फिल्मों की मार्केटिंग ठीक न होने का रोना रोते हैं। खासकर, जब ऑस्कर जैसे अवार्ड की बात होती है, वे कहेंगे, अरे क्या करें, फिल्में तो हम सही बनाते हैं लेकिन हमारी मार्केटिंग ठीक नहीं है। यह बहुत कुछ खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे जैसा मामला है। जैसा कि पहले कहा, आज के दौर में अच्छी फिल्म को दबाना संभव नहीं है। चाहे वह दुनिया के किसी कोने में बनी हो। किसी भी भाषा में बनी हो।

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आप देखिये कि असम की ही एक महिला फिल्मकार ने ‘विलेज रॉकस्टार्स’ और ‘बुलबुल कैन सिंग’ जैसी बिलकुल छोटी (बजट पंद्रह लाख से भी नीचे) फिल्में बनाई और दुनिया भर के नामी फिल्म फेस्टिवल में उन फिल्मों को लेकर घूमीं। भारत की तरफ से ‘विलेज रॉकस्टार्स’ को विदेशी भाषा के ऑस्कर अवार्ड के लिए आधिकारिक एंट्री के तौर पर भेजा गया था। लेकिन फिल्म को कोई अवार्ड नहीं मिला। यहां अवार्ड न मिलने का कारण यह नहीं था की हिंदुस्तानी फिल्मकारों की मार्केटिंग कमजोर है, बल्कि कारण यह था कि उस साल इस असमिया भाषा की फिल्म के मुकाबले कई मजबूत विदेशी फिल्में भी ऑस्कर अवार्ड के लिए मैदान में थीं।

तो, यह भी एक फैशन जैसा हो गया है यह कहना कि हमारी फिल्में मार्केटिंग और बजट की कमी की वजह से मारी जाती हैं। ऐसा बिलकुल नहीं है। असली बात यह है कि आप पूरी दुनिया के सामने कौन सी ऐसी मौलिक चीज कहते या दिखाते हैं, जो उन्होंने इससे पहले देखी नहीं है। ‘पैरासाइट’ ने यह काम किया है। दुर्भाग्य से भारतीय या हिंदी सिनेमा अभी तक यह काम नहीं कर सका है।

अंत में, हाल के वर्षों में, एक फिल्म जो ऑस्करअवार्ड के बिल्कुल करीब पहुंच गई थी, वह थी रितेश बत्रा की ‘लंच बॉक्स’। दुनिया के कई फिल्म समारोहों में इस फिल्म को लोगों ने पसंद किया। लेकिन भारत की तरफ से ऑस्कर प्रविष्टि के तौर पर भेजने वाली समिति ने इस फिल्म को आपसी राजनीति और अज्ञानता की वजह से भेजा ही नहीं!

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